अटेली विधानसभा सीट
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हरियाणा विधानसभा चुनाव में कुछ खास सीटों पर सबकी नजरें हैं। ऐसी ही सीटों में महेंद्रगढ़ जिले की अटेली विधानसभा सीट भी शामिल है। ये वही सीट है जहां से कभी मुख्यमंत्री राव बीरेंद्र सिंह जीते थे। इस चुनाव में भी राव राज परिवार की वंशज आरती राव उतरी हैं। आरती केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत की बेटी हैं।
हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी अटेली सीट की बात करेंगे। बात करेंगे इसके चुनावी इतिहास। यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ यह भी जानेंगे, इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी आपको बताएंगे…
पहले जान लेते हैं अटेली सीट के बारे में
1966 में हरियाणा राज्य के गठन के बाद राज्य में पहला विधानसभा चुनाव 1967 में हुआ। साल 1967 में जब हरियाणा का पहला विधानसभा चुनाव हुआ तब अटेली विधानसभा सीट से एन. सिंह को जीत मिली। कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में उतरे एन. सिंह ने निर्दलीय आर. जीवन को एक करीबी मुकाबले में 967 वोट से शिकस्त दी।
फरवरी 1967 में हरियाणा में पहली बार विधानसभा के चुनाव हुए। कांग्रेस को 81 में से 48 सीटें मिलीं और भगवत दयाल शर्मा दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस बार राव बीरेंद्र सिंह विधायक बन चुके थे। नई सरकार के गठ के बाद विधानसभा का सत्र बुलाया गया। विधायकों की शपथ के बाद वक्त आया नए विधानसभा अध्यक्ष को चुनने का। सदन में सभी विधायक इकट्ठा थे, मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा ने विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए जींद के विधायक दया किशन के नाम का प्रस्ताव रखा। उसी समय उन्हीं की पार्टी के एक विधायक ने राव बीरेंद्र सिंह का नाम भी प्रस्ताव कर दिया। मुख्यमंत्री दंग रह गए। वोटिंग हुई, तो राव बीरेंद्र सिंह को दया किशन से 3 वोट ज्यादा मिले। भगवत दयाल शर्मा सदन छोड़कर बाहर चले गए। आजाद भारत के इतिहास में ये पहला मौका था, जब किसी सदन में मुख्यमंत्री का प्रस्ताव खारिज हुआ। इससे हरियाणा में संवैधानिक संकट पैदा हो गया।
कांग्रेस में बगावत हो चुकी थी। राव बीरेंद्र सिंह के समर्थक कांग्रेस विधायकों और 16 निर्दलियों ने मिलकर नया दल बना लिया। भगवत दयाल शर्मा की सरकार गिर गई। राव बीरेंद्र सिंह पहली बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, 9 महीने बाद ही राज्यपाल ने बार-बार विधायकों के दल बदलने की बात कहकर विधानसभा भंग कर दी।
राव बीरेंद्र सिंह की एंट्री
अब आता है 1968 का हरियाणा विधानसभा चुनाव। इस चुनाव में अटेली सीट पर एक दिग्गज चेहरे की एंट्री होती है। ये चेहरा थे राव बीरेंद्र सिंह। ये वही राव बीरेंद्र सिंह हैं जिनके बेटे राव इंद्रजीत सिंह केंद्र सरकार में मंत्री हैं। राव बीरेंद्र सिंह का ताल्लुक हरियाणा के रेवाड़ी के शाही यदुवंशी अहीर परिवार से है। उनका परिवार राजा राव तुलाराम सिंह का वंशज है, जिसने 1857 के विद्रोह को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस चुनाव में राव बीरेंद्र सिंह अटेली के साथ ही जटुसाना सीट से भी चुनाव मैदान में उतरे थे। यहां भी उन्हें जीत मिली थी।
1977 में जब राव बीरेंद्र सिंह बेटे राव इंद्रजीत ने चुनावी राजनीति में कदम रखा। राव इंद्रजीत ने अपना पहला चुनाव जटुसाना से ही लड़ा था। इस चुनाव में इंद्रजीत को जीत मिली थी। राव बीरेंद्र के एक और बेटे राव यादवेंद्र सिंह भी 2005 में जटुसाना से ही जीतकर पहली बार विधायक बने थे। 2008 के परिसीमन के बाद जटुसाना सीट खत्म कर दी गई। इसके बाद 2009 के विधानसभा चुनाव में राव यादवेंद्र सिंह कोसली से जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।
1977 के चुनाव में राव बीरेंद्र सिंह की विशाल हरियाणा पार्टी को 5 सीटें मिली थीं। 1977 के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 3 सीटें मिली थीं। सितंबर 1978 में राव बीरेंद्र की पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया था।
1972 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में विशाल हरियाणा पार्टी के टिकट पर उतरे बंशी सिंह को सफलता मिली। उन्होंने कांग्रेस के नारी डेर सिंह को 4636 मत से शिकस्त दी।
राव बीरेंद्र सिंह को फिर मिली जीत
साल 1977, आपातकाल के बाद हरियाणा में विधानसभा चुनाव होते हैं। 1977 के चुनाव में अटेली में एक बार फिर राव बीरेंद्र सिंह ने दावेदारी पेश की। इस चुनाव में विशाल हरियाणा पार्टी के टिकट पर उतरे बीरेंद्र सिंह ने जनता पार्टी के उम्मीदवार लक्ष्मण सिंह को 12499 वोट से हराया।
साल 1980 में अटेली में उपचुनाव हुआ। इस चुनाव में बी. सिंह की जीत हुई।
1982 में हुए चुनाव में भी अटेली से निर्दलीय उम्मीदवार निहाल सिंह को जीत मिली। निहाल कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार बंसी सिंह को महज 193 वोट से हराकर विजयी हुए।
1987 के चुनाव में अटेली पर लोक दल के टिकट पर उतरे लक्ष्मी नारायण को सफलता मिली। नारायण ने कांग्रेस उम्मीदवार ओम प्रकाश को 2575 मत से शिकस्त दी।
अब आता है 1991 का हरियाणा विधानसभा चुनाव। इस चुनाव में अटेली सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार बंसी सिंह को जीत मिली। बंसी सिंह ने जनता पार्टी के प्रत्याशी अजीत सिंह को महज 66 मत से हराकर यह चुनाव जीता।
1991 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 1996 में हुए। इस चुनाव में अटेली सीट पर कांग्रेस के नरेन्द्र सिंह विजयी हुए। नरेन्द्र ने एचवीपी के उम्मीदवार राव ओम प्रकाश को 2844 मत से हराया।
1996 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 2000 में हुए। इस चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर नरेन्द्र सिंह उतरे। उन्होंने इंडियन नेशनल लोक दल के उम्मीदवार संतोष सिंह को 334 वोट से शिकस्त दी।
2005 में अटेली सीट का परिणाम निर्दलीय उम्मीदवार नरेश यादव के नाम रहा। उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार नरेन्द्र सिंह को 2956 वोट से हराया।
2009 के हरियाणा में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर उतरीं अनीता यादव को जीत हासिल हुई। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार संतोष यादव को 973 वोट से हरा दिया।
भाजपा का खाता खुला
अब आता है 2014 का विधानसभा चुनाव जिसमें अटेली सीट पर भाजपा का खाता खुला। अटेली की सियासी लड़ाई भाजपा के उम्मीदवार संतोष यादव के नाम रही। उन्होंने इनेलो के टिकट पर उतरे सतबीर को 48601 मत के एक बड़े अंतर से शिकस्त दी।
2019 के विधानसभा चुनाव में अटेली में मुकाबला भाजपा और बहुजन समाज पार्टी के बीच रहा। भाजपा ने सीताराम को अपना उम्मीदवार बनाया तो बसपा के टिकट पर अत्तरलाल उतरे। भाजपा यह चुनाव 18406 मत से जीतने में सफल रही। भाजपा प्रत्याशी सीताराम को 55793 वोट मिले जबकि बसपा प्रत्याशी अत्तरलाल को 37387 वोट मिले।
इस बार कौन आमने-सामने
अब बात 2024 के चुनाव की कर लेते हैं। हरियाणा की अटेली सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। यहां पर त्रिकोणीय समीकरण माना जा रहा है। भाजपा ने केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी आरती सिंह राव को उम्मीदवार बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस ने पूर्व विधायक अनीता यादव पर भरोसा जताया है। आप से सुनील राव, जजपा-आसपा से अभिमन्यु राव चुनाव मैदान में हैं। अटेली सीट पर कुल आठ प्रत्याशी मैदान में हैं। महेंद्रगढ़ और रेवाड़ी जिले की सात विधानसभा सीट में से छह पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर मानी जा रही है। हालांकि, अटेली विधानसभा सीट ऐसी है जहां मुकाबला त्रिकोणीय बना हुआ है। यहां 60 प्रतिशत यादव समाज सहित पिछड़ा वर्ग और 15 प्रतिशत ब्राह्मण सहित सवर्ण मतदाता हैं।
केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत की प्रतिष्ठा इस चुनाव में दांव पर लगी है। उनकी राजनीतिक वारिस व बेटी आरती राव महेंद्रगढ़ जिले की अटेली विधानसभा सीट से भाजपा की उम्मीदवार हैं। यह उनका पहला चुनाव है। उनके पिता छह बार के सांसद हैं।
कांग्रेस ने पूर्व विधायक व सीपीएस अनीता यादव पर दांव खेला है। पिछला विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद वह इलाके में सक्रिय रही हैं। इससे लोगों के साथ उनका जुड़ाव है। वहीं, इनेलो-बसपा के साझा उम्मीदवार अतर सिंह ने अपने समर्थकों की वजह से चुनाव को रोमांचक बना दिया है। उनके रोड शो व रैलियों में उतनी ही भीड़ जुट रही है, जितनी भाजपा व कांग्रेस के नेताओं की रैलियों में।
माैजूदा विधायक से नाराजगी
अटेली सीट भाजपा दो बार से जीतती आई है। भाजपा ने इस बार मौजूदा विधायक सीताराम यादव का टिकट काट आरती राव को दिया है। सीताराम यादव के कार्यकाल को लेकर लोगों में खासी नाराजगी दिखती है। इस नाराजगी को देखते ही भाजपा ने आरती को उतारा है।
राव की साख का सवाल..योगी की करवानी पड़ी जनसभा
राव इंद्रजीत को राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता राव बीरेंद्र सिंह पूर्व सीएम रह चुके हैं। भाजपा ने टिकट वितरण के दौरान उन्हें फ्री हैंड दिया और दक्षिण हरियाणा की अधिकतर सीटों पर उनके पसंदीदा लोगों को उम्मीदवार बनाया है। इनमें से एक उनकी बेटी भी शामिल हैं। लिहाजा उन्हें अपनी बेटी के साथ बाकी उम्मीदवारों को जिताने की भी जिम्मेदारी है। परिणाम यदि विपरीत आए तो उनकी साख पर असर होगा। इसीलिए उनकी कोशिश है कि उनकी बेटी ने सिर्फ जीत नहीं, बल्कि रिकॉर्ड जीत हासिल करें।
राव इंद्रजीत के पास चुनाव लड़ने और लड़वाने का काफी अनुभव है। लिहाजा उन्होंने आरती का चुनाव मैनेजमेंट संभाल रखा है। उनकी बेटी का चुनाव कितना फंसा हुआ, इसे इस बात से समझा जा सकता है राव इंद्रजीत को अटेली में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जनसभा करवानी पड़ी है। इसके अलावा वह इलाके के लोगों को मैनेज करने में जुटे हैं। वह रूठों को भी मनाने में भी जुटे हैं।
अटेली से कांग्रेस उम्मीदवार व पूर्व सीपीएस अनीता यादव 2009 में विधायक चुनी जा चुकी हैं। वह लोगों के बीच जाकर अटेली के ठप पड़े विकास कार्यों को मुद्दा बना रही हैं। चुनाव टक्कर का है और रोजाना समीकरण बदलते हैं। अगले दो दिन में क्या हो जाए, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।
पिछली बार दूसरे नंबर रहे अतरलाल भी मुकाबले में तीसरे उम्मीदवार अतरलाल हैं। वह बसपा व इनेलो के साझा उम्मीदवार हैं। इलाके में उनकी पहचान नेताजी के नाम से है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार सीताराम से वह करीब 18 हजार वोट से हारे थे और दूसरे नंबर पर रहे थे। उनके साथ प्लस प्वाइंट यह है कि तीनों उम्मीदवारों में सिर्फ वही स्थानीय हैं। लोगों के अनुसार, वे लोगों के सुख-दुख में पहुंचते हैं।
वह 15 साल से चुनाव लड़ रहे हैं, मगर जीत एक भी बार नसीब नहीं हुई है। दो लाख आबादी लाल वाले क्षेत्र में करीब आठ हजार राजपूत और करीब 30 हजार एससी वोटर हैं। अतरलाल राजपूत समुदाय से हैं और इसलिए वह इन वोटों को लामबंद करने में जुटे हैं। वह लोगों के बीच बेरोजगारी और शिक्षा के साथ आरती व अनीता को बाहरी उम्मीदवार बताकर लोगों को लुभाने में जुटे हैं।
भाजपा को भितरघात का भी खतरा
राव इंद्रजीत का कद जितना बड़ा है, उतने ही उनके राजनीतिक दुश्मन भी हैं। इस सीट से भाजपा नेता व अटेली की पूर्व विधायक और पूर्व डिप्टी स्पीकर संतोष यादव भी दावेदार थीं। जब आरती को टिकट मिला तो उन्होंने भी नामांकन कर दिया। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के समझाने के बाद वह मान गईं और नामांकन वापस ले लिया। मगर वह चुनाव प्रचार में नहीं दिख रही हैं।