टोहाना। कभी सामूहिक उल्लास, गीत-संगीत और झूला-झूलन के लिए पहचाना जाने वाला सावन का महीना अब शहरों और कस्बों में एक औपचारिक पर्व बनकर रह गया है। बदलती जीवनशैली, एकल परिवारों की बढ़ती संख्या और आधुनिकता के प्रभाव से त्योहारों की रौनक लगातार फीकी पड़ती जा रही है।
महिलाओं ने कहा कि एक समय था जब सावन का आगमन होते ही गांव और मोहल्लों में महिलाओं की चहल-पहल बढ़ जाती थी। वृक्षों पर झूले डालकर सामूहिक रूप से झूलने की परंपरा थी। महिलाएं टोली बनाकर तीज के गीत गाती थीं, नृत्य करती थीं और पूरा महीना त्योहारों की उमंग में डूबा रहता था लेकिन अब यह परंपरा सिर्फ यादों तक सीमित रह गई है।
जरूरत है परंपराओं को संजोने की
महिलाओं ने कहा कि बदलते दौर में जहां आधुनिकता ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं पारंपरिक त्योहारों की आत्मा को नुकसान भी पहुंचाया है। सावन और तीज जैसे पर्व केवल उत्सव नहीं, सामाजिक एकता और पारिवारिक जुड़ाव के प्रतीक हैं। ज़रूरत है कि इन परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए और उन्हें केवल रस्म बनकर नहीं, बल्कि हर्षोल्लास के साथ मनाया जाए ताकि सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखा जा सके।
महिलाएं बोलीं- त्योहार अब आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं
पहले सास-बहू, ननद-भाभी और मां-बेटी सभी मिलकर सावन मनाती थीं। अब एकल परिवारों और सीमित सामाजिक संपर्क के चलते वह मिलनसारिता और सामूहिकता समाप्त हो गई है। त्योहार अब केवल रस्म अदायगी बनकर रह गए हैं।
-रजनी, गृहिणी।
भौतिकवादी सोच और आत्मकेंद्रित जीवनशैली ने न केवल सावन की खुशियों को सीमित कर दिया है, बल्कि पर्वों की आत्मा को भी प्रभावित किया है। अब लोग मिठाइयां खाने से भी कतराते हैं। त्योहारों को सोशल मीडिया पोस्ट तक ही सीमित कर दिया गया है।
- रितू, गृहिणी।
श्रावणी माह की शिवरात्रि जा चुकी है। इस माह में तीज के साथ रक्षाबंधन का पर्व भी आता है, जो भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। समय के साथ त्योहारों की चमक फीकी पड़ती जा रही है। मोबाइल फोन ने सभी को आत्मकेंद्रित कर दिया है।
-सृष्टि, गृहिणी।
एक समय था जब बहू के पीहर से कोथली और सिंधारा आता था, जिसमें कपड़े, मिठाइयां, घेवर, फिरनी व अन्य पकवान होते थे। मोहल्ले में बांटने की परंपरा थी। अब यह परंपरा भी खोती जा रही है। अब कोथली एक डब्बा मिठाई और कुछ पैसों तक सिमट गई है।
-सुनीता, गृहिणी।
सावन में जब पति घर लौटते थे, तो स्त्रियां सोलह शृंगार कर उनकी प्रतीक्षा करती थीं। उनके आने पर झूले झूलना, गीत गाना और मिठाइयों से स्वागत करना सावन की परंपरा हुआ करती थी। अब कामकाज और जीवन की व्यस्तता ने वह भावनात्मक जुड़ाव छीन लिया है।
-उषा जैन, गृहिणी।