फतेहाबाद। तनाव, अकेलापन और मानसिक दबाव धीरे-धीरे जिंदगी पर भारी पड़ सकता है। समय रहते इसके संकेतों को पहचानकर मदद ली जाए तो गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है। नागरिक अस्पताल के मनारोग विभाग में इस साल अप्रैल से जून तक की ओपीडी रिपोर्ट में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों की तस्वीर भी चिंता बढ़ाने वाली है।
इस अवधि में 3,295 ओपीडी मामले सामने आए। इनमें 1,986 मरीज अवसाद और 494 मरीज एंग्जायटी या पैनिक डिसऑर्डर से पीड़ित मिले। रिपोर्ट में 10 मरीजों में आत्मघाती जोखिम यानी आत्महत्या से जुड़े विचार या व्यवहार दर्ज किए गए। अस्पताल की रिपोर्ट में अप्रैल से जून के बीच ओपीडी में 453 नए मरीज पहुंचे जबकि 2,842 मरीज फॉलोअप के लिए आए।
इस दौरान 2,171 मरीजों की काउंसिलिंग भी की गई। हाल ही में गांव मेहूवाला में आंगनबाड़ी वर्कर ने तनाव के चलते बच्चों की हत्या के बाद खुद सुसाइड कर लिया था। ये ही नहीं जिले में हर चार पांच दिन में एक सुसाइड का मामला सामने आ रहा है। अधिकतर मामलों में मानसिक तनाव कारण सामने आते है।
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अवसाद सबसे बड़ी वजहों में शामिल
विशेषज्ञों के अनुसार लगातार तनाव, पारिवारिक या सामाजिक परेशानियां, पढ़ाई या काम का दबाव, रिश्तों में परेशानी, असफलता का डर और लंबे समय तक अकेलापन मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। हर व्यक्ति में असर अलग-अलग दिखाई देता है। ऐसे में परेशानी को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते परिवार या विशेषज्ञ से बात करना जरूरी है।
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अकेलापन और व्यवहार में बदलाव को न करें नजरअंदाज
नागरिक अस्पताल के मनारोग विशेषज्ञ डॉ. गिरीश का कहना है कि अचानक लोगों से दूरी बनाना, पहले की पसंदीदा गतिविधियों में रुचि खत्म होना, लगातार उदास या चिड़चिड़ा रहना, नींद और दिनचर्या में बदलाव तथा व्यवहार में अचानक परिवर्तन चेतावनी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे बदलाव दिखें तो व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय उससे शांतिपूर्वक बातचीत करनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए।
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परिवार की भूमिका सबसे अहम
मानसिक तनाव से जूझ रहे व्यक्ति को डांटने या उसकी परेशानी को छोटा बताने के बजाय उसकी बात सुनना जरूरी है। परिवार का भरोसा, नियमित बातचीत और समय पर उपचार व्यक्ति को संकट से बाहर आने में मदद कर सकता है। आत्मघाती विचार या जोखिम के संकेत नजर आने पर इसे गंभीरता से लेते हुए तत्काल किसी भरोसेमंद परिजन और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए।
-डॉ. गिरीश, मनोचिकित्सक