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गांव मेहूवाला के नरेंद्र जाखड़ मात्र 21 साल की अवस्था में कारगिल लड़ाई में हो गए थे शहीद

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फतेहाबाद। कारगिल युद्ध में गांव मेहूवाला के जवान नरेंद्र जाखड़ ने दुश्मनों से मुकाबला करते हुए 9 जुलाई 1999 को वीरगति प्राप्त की थी। नरेंद्र जाखड़ आईटीआई कर चुके थे। सेना में भर्ती होने के बाद उनका बिजली निगम में लाइनमैन पद के लिए भी चयन हो गया, लेकिन नरेंद्र ने लाइनमैन की नौकरी करने के बजाय देश सेवा को चुना और मात्र 21 साल की उम्र में ही कारगिल युद्ध में देश के लिए काम आ गए। नरेंद्र ने भले ही देश के लिए शहादत दे दी पर उनके नाम से गांव में स्टेडियम व फतेहाबाद-भट्टू कलां मार्ग पर बोर्ड का आज भी इंतजार है। संवाद
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पूरे परिवार की पृष्ठभूमि जुड़ी है सेना से
शहीद नरेंद्र सिंह का जन्म 17 सितंबर 1978 को एक ऐसे परिवार में हुआ, जो देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत था। उनके दादा अमर सिंह जाखड़ व पिता जय सिंह जाखड़ भी बीएसएफ में थे। उनके चाचा बिहारी लाल जाखड़ 17 जाट रेजिमेंट में थे, तो उनके परिवार के गंगा सिंह, जगदीश, इंद्राज, भागीरथ सिंह, प्रताप सिंह, चिरंजीलाल व सतपाल सिंह भी सेना में सेवा दे रहे हैं। नरेंद्र सिंह की प्रारंभिक शिक्षा मध्यप्रदेश के फौजी कैंट टैकनपुर में हुई, जहां उनके पिता सीमा सुरक्षा बल में थे। वहां पर पढ़ाई के दौरान के दिमाग पर देशसेवा का ऐसा जुनून रहा कि उन्होंने सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने की ठान ली। पिता की 24 वर्ष सेवा पूरी होने के बाद उन्हें पिता के साथ गांव लौटना पड़ा और बाकी की पढ़ाई उन्होंने बाल भारती स्कूल में पूरी की। 10वीं पास करने के बाद नरेंद्र सिंह ने आईटीआई की। इसी दौरान 1996 में एक भर्ती रैली में सब परीक्षाएं पास कर नरेंद्र सिर्फ 18 साल की उम्र में ही सेना में भर्ती हो गए। वह 7 जाट रेजिमेंट में थे। 1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ तो उससे पहले मार्च में नरेंद्र घर पर दो माह की छुट्टियों पूरी कर करके गया था। इसके बाद कारगिल युद्ध आरंभ हो गया। इसी युद्ध में नरेंद्र दुश्मनों से मुकाबला करते हुए 9 जुलाई को देश की सरहदों की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।
पिता बोले- युद्ध के दौरान नहीं हुई थी बात, फिर शहादत का ही संदेश आया
शहीद नरेंद्र के पिता जयसिंह जाखड़ ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान उनकी नरेंद्र से कोई बात नहीं हुई। बस उनको पता चला कि 9 जुलाई को उनका बेटा शहीद हो गया है। तिरंगे से लिपटा उसका शव गांव में आया।
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-शहादत से एक माह पहले हुआ था रिश्ता
कारगिल युद्ध में शहीद हुए नरेंद्र के सेना में भर्ती होने के बाद परिवारवालों ने उनका रिश्ता देखना आरंभ कर दिया था। शहादत से एक माह पहले ही नरेंद्र का राजस्थान में रिश्ता तय किया गया था, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। अब उनके छोटे भाई रविंद्र रोजगार विभाग में असिस्टेंट के पद पर कार्यरत हैं। सरकार द्वारा उनको नौकरी दी गई थी।
त्रिशूलट घाटी में पहली गोली जांघ में लगी, दूसरी सिर में
जाट रेजिमेंट के सिपाही नरेंद्र सिंह को कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मनों से मुकाबला करने के लिए भेजा गया। वे दुश्मनों को पीछे खदेड़ते हुए मशकोह घाटी के प्वाइंट 5301 पर पहुंच गए। वहां पर बहादुरी से मुकाबला करते हुए दुश्मनों को पीछे खदेड़ दिया। इसके बाद त्रिशूल घाटी पर तिरंगा लहरा दिया। पर रात का समय होने के कारण दुश्मनों ने मौके का फायदा उठाते हुए हमला बोल दिया। उनसे मुकाबला करते हुए एक गोली नरेंद्र सिंह की जांघ और दूसरी सिर में लगी। घायल नरेंद्र सिंह मशकोह घाटी के प्वाइंट 5301 पर गिर पड़े और भारत माता का जयकारा लगाते हुए शहीद हो गए।
नरेंद्र का दोस्त भी रहा सेना में, हुआ शहीद
गांव मेहूवाला के कारगिल शहीद नरेंद्र के अलावा उनके सहपाठी खेतपाल हुड्डा भी सेना में भर्ती हुए। दोनों काफी अच्छे दोस्त थे। नरेंद्र के पिता बताते हैं कि जब भी दोनों को सेना से छुट्टी मिलती थी, वे साथ ही रहते थे। सेना के एक ऑपरेशन में खेतपाल भी शहीद हो गए। अब गांव मेहूंवाला में शहीद नरेंद्र व खेतपाल दोनों की प्रतिमाएं लगी हुई हैं।
हमें खुशी है कि हम उस गांव के निवासी हैं, जहां के युवा सेना में भर्ती हुए और देश की सेवा करते हुए शहीद भी हुए। शहीद नरेंद्र जाखड़ व खेतपाल हुड्डा की शहादत की पूरे गांव में गर्व के साथ चर्चा होती है। गांव के युवाओं के लिए दोनों ही प्रेरणा स्त्रोत हैं।
पवन कुमार, ग्रामीण मेहूवाला
नरेंद्र की शहादत के बाद सरकार से उनको सभी सुविधाएं मिली, गैस एजेंसी व अन्य सभी सुविधाएं मिल चुकी हैं, लेकिन मलाल है कि आजतक नरेंद्र के नाम से गांव मेहूवाला में स्टेडियम का निर्माण किया जाना था, जो आज तक नहीं हुआ। फतेहाबाद से भट्टूकलां सड़क का नाम नरेंद्र सिंह के नाम से रखा गया था। इसका एक छोटा सा बोर्ड भी फतेहाबाद की लालबत्ती चौक पर लगाया गया, लेकिन वह भी टूट गया, इसके बाद इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। नरेंद्र की शहीद होने का दुख आज भी है, लेकिन इस बात का गर्व है कि उसने देश की सरहदों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए।
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-जय सिंह जाखड़, शहीद नरेंद्र के पिता
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