एक रुपये के लिए लाशों के बीच 38 साल रहना। ये सुनने में थोड़ा अटपटा अवश्य
लग सकता है लेकिन टोहाना के सामान्य अस्पताल में बतौर पोस्टमार्टम सहयोगी
की नौकरी कर रहा ईश्वरदास ने वास्तव में यह जिंदगी जी है।
इतना ही नहीं, 1977 से शुरू हुआ लाशों के पोस्टमार्टम में मदद करने का ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। आर्थिक बदहाली से त्रस्त ईश्वरदास ने अब स्वास्थ्य मंत्री से मदद की गुहार लगाई है। उसने कहा कि 14 गुणा महंगाई तो बढ़ी लेकिन उसको मिलने वाला मेहनताना आज भी उतना ही है।
38 साल से कार्यरत है सामान्य अस्पताल में
पोस्टमार्टम सहयोगी ईश्वरदास ने बताया कि वह करीबन 38 साल से सफाई कर्मचारी के पद पर कार्यरत है। पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों को वह हर संभव सहयोग करता है।
जिसके बदले में सरकार द्वारा उसे मात्र एक रुपया मेहनताना दिया जाता है। यह प्रथा पिछले लंबे समय से चली आ रही है। उसने बताया कि अस्पताल में रोज कई शव आते हैं।
जिनका पोस्टमार्टम किया जाता है उनसे न केवल बीमारियां फैलने का भय बना रहता है। चिकित्सक को पोस्टमार्टम के बाद महंगे उपकरणों से अपने हाथ के कीटाणु साफ कर लेते हैं परंतु 1 रुपये में वो क्या करे।
कई बार तो शव के परिजन भी हो जाते हैं बेहोश, लेकिन वो रहता है साथ
ईश्वर दास का कहना है कि कई बार शव बहुत बुरी अवस्था में होता है। ऐसे में मृतक के परिजन भी ऐसे शवों को देखकर शव गृह में बेहोश हो जाते है लेकिन उसे शव के पास खडे़ होकर उसका पोस्टमार्टम करने के लिए सहयोग करना ही पड़ता है।
ऐसे में उन्हें सरकार मात्र एक रुपया मेहनताना देकर उनसे ऐसे मुश्किल कार्य करवाती है जिससे उनका शोषण हो रहा है।
स्वास्थ्य मंत्री से लगाई गुहार
ईश्वरदास प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज से मांग की है कि महंगाई को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्री को इनके परिवार खर्च चलाने के लिए कम से कम सौ रुपये प्रति शव पोस्टमार्टम दिया जाए।
क्या कहते हैं एसएमओ
इस बारे में अस्पताल के एसएमओ डा सतीश गर्ग से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये रेट पुरानी सरकार द्वारा तय किया गया था। अगर सरकार ये मेहनताना बढ़ाकर देगी तो कर्मी को दे दिया जाएगा।