फतेहाबाद। जिले में 42 साल बाद कांग्रेस ने इतिहास रचा है। 1982 के बाद पहली बार फतेहाबाद जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के विधायक बने हैं। इन तीनों जीत के साथ जिले में कई रिकॉर्ड दर्ज हो गए हैं। फतेहाबाद से बलवान सिंह दौलतपुरिया, रतिया से जरनैल सिंह और टोहाना से परमवीर सिंह ने भाजपा प्रत्याशियों को हराकर जीत दर्ज की है।
बलवान ने दुड़ाराम को 2252, जरनैल सिंह ने सुनीता दुग्गल को 21,442 जबकि परमवीर सिंह ने देवेंद्र सिंह बबली को 10836 मतों से हराया है। सबसे बड़ी जीत दर्ज कर जरनैल सिंह ने 42 साल बाद आम चुनाव में रतिया से कांग्रेस की पताका फहराई है।
गौरतलब है कि वर्ष 1982 में फतेहाबाद से गोबिंद राय बतरा, रतिया से नेकीराम और टोहाना से सरदार हरपाल सिंह कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। इसके बाद कभी फतेहाबाद तो कभी टोहाना में कांग्रेस जीती, लेकिन रतिया में हार गई। साल 2011 के उपचुनाव में रतिया से जरनैल सिंह जरूर जीते, लेकिन तब फतेहाबाद में कांग्रेस हार गई थी। फतेहाबाद विधानसभा क्षेत्र से बलवान सिंह कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले पहले जाट विधायक बने हैं।
इसके अलावा उन्होंने अपने दूसरे चुनाव में दूसरी बार पूर्व मुख्यमंत्री स्व.भजनलाल के भतीजे दुड़ाराम को शिकस्त दी है। इससे पहले वह दुड़ाराम को साल 2014 में इनेलो के टिकट पर 3505 वोटों से हरा चुके हैं। वहीं, टोहाना से परमवीर सिंह के परिवार की आठवीं जीत हुई है। इससे पहले दो बार परमवीर सिंह खुद और पांच बार उनके पिता सरदार हरपाल सिंह विधायक रह चुके हैं। परमवीर सिंह तीसरी बार विधायक बने हैं।
वर्ष 2019 में भाजपा के टिकट पर फतेहाबाद से दुड़ाराम व रतिया से लक्ष्मण नापा विधायक बने जबकि टोहाना से जजपा के टिकट पर देवेंद्र बबली जीते थे। मगर चुनाव से पहले लक्ष्मण नापा भाजपा छोड़कर कांग्रेस में चले गए जबकि देवेंद्र बबली जजपा छोड़कर भाजपा में आ गए।
सत्ता विरोधी लहर का शिकार हुए तीनों भाजपा प्रत्याशी :
तीनों जगह से भाजपा प्रत्याशी सत्ता विरोधी लहर का शिकार हो गए। इसके अलावा भाजपा से जाट समाज, कर्मचारियों व किसान संगठनों की नाराजगी भी इन पर भारी पड़ी है। रतिया में किसान संगठनों का सबसे अधिक प्रभाव रहा है। किसानों का बार-बार विरोध झेलने के कारण सुनीता दुग्गल के चुनाव को पहले से ही कमजोर माना जाने लगा था। वहीं, फतेहाबाद में जाट समाज व कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन बहाली के नाम पर एकजुट होकर अधिकांश वोट कांग्रेस के पक्ष में डाले। वहीं, खुद के बिश्नोई समाज में भी काफी लोगों की नाराजगी को दुड़ाराम दूर नहीं कर पाए। टोहाना में देवेंद्र बबली को सुभाष बराला का साथ नहीं मिल पाया और न ही वह किसान संगठनों के विरोध को कम कर पाए। इन्हीं विरोधी समीकरणों ने तीनों जगह भाजपा की हार की पटकथा लिख दी।