हरियाणा के फतेहाबाद के गांव भोड़िया खेड़ा में 1977 में हुआ सरपंच पद का चुनाव और इसके बाद हुआ घटनाक्रम आज भी ग्रामीणों की जुबां पर है। सर्वसहमति से बनाए गए सरपंच को मात्र ढाई साल बाद ही पंचों ने तख्तापलट करते हुए हटा दिया था और दूसरे व्यक्ति को सरपंच पद पर काबिज कर दिया था। यह वह दौर था जब पंच ही गांव के सरपंच को चुनते थे।
पंजाब ग्राम पंचायत एक्ट-1952 के तहत पहले ग्राम पंचायतों का कार्यकाल महज तीन साल ही था। पंच मिलकर सरपंच का चुनाव करते और अविश्वास प्रस्ताव लाकर पद से हटा सकते थे। पंचायतों में महिलाओं को कोई कोटा उस समय नहीं था और पंचायत में एससी एसटी वर्ग से एक पंच चुना जाना अति आवश्यक था।
उस समय बड़ी बात यह भी थी कि गांवों में वार्ड प्रणाली नहीं थी, जिसे सबसे अधिक वोट मिलता था, वही पंच कहलाता था। यहां यह भी गौर करने लायक है कि भले ही पंच अपना सरपंच चुनते थे, लेकिन पंचायत में उनकी सहभागिता सरपंच से कम नहीं थी, क्योंकि वह कभी भी रेज्यूलेशन पास करके सरपंच को हटा सकते थे। संवाद
दो सरपंचों ने निभाया पांच साल का कार्यकाल
गांव भोड़िया खेड़ा में वैसे तो सरपंच पद के लिए 13 चुनाव हो चुके हैं। बात 1977 की है, जब गांव वालों से मिलकर बलदेव सिंह को सर्व सहमति से गांव का सरपंच चुन लिया था। इसके बाद पंचों के चुनाव हुए तो आठ पंच चुनकर ग्राम सभा में पहुंचे। ढाई साल तक बलदेव सिंह गांव के सरपंच रहे। इसके बाद पंचों की सरपंच के साथ नहीं बनी और पंचों ने एक रेज्यूलेशन पास करके बलदेव सिंह को सरपंच पद से हटा दिया।
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उनके स्थान पर गुरदयाल सिंह को सरपंच बनाया गया और अगले ढाई साल तक गुरदयाल गांव के सरपंच रहे। गांव के बुजुर्ग रामचंद्र बताते हैं कि पहले पंच ही सरपंच चुनते थे और उनको हटा देते थे। उनके गांव में 1977 में पांच साल का कार्यकाल दो सरपंचों ने निभाया। पहले बलदेव सिंह को पूरे गांव ने सर्व सहमति से सरपंच चुन लिया था, लेकिन ढाई साल बाद ही पंचों ने उसे पद से हटा दिया।
1963 में आठ साल तक हुआ था सरपंचों का सीधा चुनाव
1963 में पंजाब सरकार ने पंचायती राज एक्ट में संशोधन किया, जिसके तहत सरपंच का चुनाव सीधे तौर पर मतदान से होने लगा। वहीं सरपंचों का कार्यकाल भी पांच साल कर दिया गया। लेकिन हरियाणा में यह व्यवस्था आठ साल ही रही।
बंसीलाल सरकार ने फिर दिया पंचों को सरपंच चुनने का अधिकार
एक नवंबर 1966 को हरियाणा पंजाब से अलग हो गया और 1971 में आई बंसीलाल सरकार में एक बार फिर पंचायती राज एक्ट में बदलाव किया गया। इस सरकार ने एक बार फिर पंचों को ही सरपंच चुनने का अधिकार दे दिया, हालांकि सरपंचों के कार्यकाल में कोई बदलाव नहीं किया गया। वह पांच साल ही रहा।
1978 में देवीलाल सरकार ने फिर किया बदलाव
इसके बाद 1978 में आई चौधरी देवीलाल की सरकार ने पंचायती राज एक्ट में फिर संशोधन किया और सरपंच चुनने का सीधा अधिकार ग्रामीण मतदाताओं को दे दिया। यह वही दौर था जब महिलाओं की भी ग्रामीण सरकार में एंट्री होने लगी और पंचायत में महिला की एक सीट तय की गई। मौजूदा प्रणाली में सरपंच पद के लिए महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण है।