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भांजे की शादी के लिए भात की तैयारियां छोड़कर दिल्ली आंदोलन में डटे नानूराम

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तीन कृषि कानूनों के खिलाफ केंद्र सरकार के विरोध में दिल्ली कूच करने वाले किसान कई त्याग कर रहे हैं। कोई काम-धंधे की परवाह नहीं कर रहा तो कोई विवाह जैसे घरेलू कार्यक्रमों में भी भागीदारी नहीं कर पा रहे हैं।
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गांव धारसूल निवासी किसान नानूराम कृषि को पहला धर्म मानते हुए शुरू से ही तीन कृषि कानूनों के विरोध में डटे हुए हैं। किसान होने के साथ साथ नानूराम व्यवसायी भी हैं, जो इंटरलॉकिंग टाइलें बनाने की फैक्टरी भी चलाते हैं। मगर व्यवसाय प्रभावित होने की चिंता त्याग कर वे एक सप्ताह से आंदोलन का हिस्सा बने हुए हैं। नानूराम के सगे भांजे की शादी है। इसे लेकर नानूराम की बहन कृष्णा अपने मायके गांव धारसूल में भात का न्यौता देने की रस्म निभाने पहुंची थी। मगर मायके में बड़ा भाई नानूराम नहीं मिला। हालांकि, पीहर पक्ष में छोटे भाईयों के अलावा भाभियों व भतीजों से खूब सम्मान मिला। कृष्णा भात का न्योता देकर तो वापस चली गई, लेकिन बड़े भाई के इस खुशी के मौके पर शामिल नहीं होने का दर्द भी मन में रहा।
किसान का बेटा होने के नाते खेती को बचाना मेरा धर्म
किसान नानूराम ने कहा कि भात भरने का न्योता देने पहुंची बहन को न मिलने का उन्हें भी खेद है। किसान का बेटा होने के नाते आंदोलन में शामिल होना मेरा पहला धर्म है। दूर बैठे हुए भी बहन के भात भरने के न्यौते को स्वीकार कर लिया है। घर पहुंची बहन को परिवार के बाकी सभी सदस्यों ने पूरा मान-सम्मान दिया है। उन्होंने कहा कि आंदोलन में ज्यादा दिन लगे तो उनके पारिवारिक सदस्य ही भात भरने की रस्म अदा करेंगे। शादी के दिन दिल्ली में आंदोलन में व्यस्त रहे तो वे फोन पर ही भांजे को आशीर्वाद देंगे।
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