हरियाणा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देशानुसार शनिवार को जिला व उपमंडल स्तर पर राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया गया। लोक अदालत में सुनवाई के लिए 1065 मामले रखे गए, जिनमें 562 मामलों का निपटारा हो गया। इन मामलों में एक करोड़ 2 लाख 4 हजार 133 रुपये की राशि जुर्माना व समझौते के रूप में पास की गई।
सीजेएम रामावतार पारीक ने बताया कि प्री-लिटिगेशन के मामलों में 320 में से 97 मामलों का निपटारा किया गया। 98 हजार 621 रुपये जुर्माना व समझौता राशि के रूप में पास किए गए हैं। इसी प्रकार से कोर्ट में लंबित मामलों के 745 मामलों में से 465 मामलों का निपटारा किया गया। एक करोड़ एक लाख 5 हजार 512 रुपये जुर्माना व समझौता राशि के रूप में पास किए गए हैं। सड़क दुर्घटना के क्लेम के 60 मामलों में से 13 मामलों का निपटारा किया गया, जिनमें 81 लाख 33 हजार रुपये की राशि का मुआवजा पास किया गया। वैवाहिक मामलों से संबंधित 121 में से 83 मामलों का निपटारा किया गया।
इन न्यायाधीशों ने की सुनवाई
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव एवं मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रामावतार पारीक के मुताबिक जिला स्तर पर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार, प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय हेमराज मित्तल, अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ईश्वर दत्त, उपमंडल रतिया में एसडीजेएम पवन कुमार तथा उपमंडल टोहाना में एसडीजेएम सुनील कुमार की अदालतों में मामलों की सुनवाई की गई।
इन मामलों की हुई सुनवाई
राष्ट्रीय लोक अदालत में न्यायाधीशों ने वाहन दुर्घटना मुआवजा, मजदूरी विवाद, बैंक ऋण, राजस्व, नौकरी से संबंधित मामले, बच्चों व पत्नी के लिए भरण पोषण आदि से संबंधित लंबित विवाद, वैवाहिक मामले, जमीन अधिग्रहण मुआवजा, बाढ़-पीड़ित, बिजली, पानी बिल, बैंक चेक बाउंस मामले व राजीनामा योग्य आपराधिक मामलों के केसों की सुनवाई की।
लोक अदालत के फैसलों को नहीं दे सकते चुनौती
सीजेएम रामावतार पारीक ने बताया कि लोक अदालत में किसी की हार या जीत नहीं होती। मामलों का निपटान दोनों पक्षों की आपसी सहमति से होता है। इसलिए फैसले को अन्य किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। सीजेएम ने कहा कि लोक अदालत के माध्यम से मामलों का निपटारा करवाने से समय व धन की बचत होती है।
क्या है लोक अदालत में प्रक्रिया
एडवोकेट दीपांशु सिंगला ने बताया कि लोक अदालत में केवल उन्हीं मामलों का निपटारा होता है, जिनमें दोनों पक्षों के बीच सहमति बन जाती है। यदि एक पक्ष भी सहमत नहीं है तो मामला लंबित रहता है। गंभीर किस्म के आपराधिक मामलों को नहीं निपटाया जा सकता, जो समझौता योग्य नहीं है। खासकर, सिविल किस्म के मामले निपटाए जाते हैं। दोनों पक्षकार खुद या अपने वकील के जरिये कोर्ट को सूचित करते हैं कि वे समझौता करना चाहते हैं। उस केस को लोक अदालत के लिए रख लिया जाता है। यानी लोक अदालत में पंचायती व्यवस्था अनुसार राजीनामा होता है।