फतेहाबाद। जिले का गांव काजलहेड़ी कछुओं के सहारे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होने लगा है। करीब 100 साल पुराने कछुए गांव के तालाब में सुरक्षित माहौल में पल रहे हैं। ताली बजाते ही ये कछुए पानी से बाहर निकल कर आ जाते हैं। बिश्नोई बहुल गांव होने के कारण यहां जीव रक्षकों की कमी नहीं है। यही जीवरक्षक इन कछुओं की न केवल रक्षा करते हैं, बल्कि इनके खाने-पीने की व्यवस्थाओं को भी पर्याप्त रखते हैं।
गांव गोरखपुर स्थित परमाणु संयंत्र को तैयार कर रही न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) ने तालाब के चारों ओर जाली लगवा दी है। इससे इनकी सुरक्षा मजबूत हुई है। पिछले एक साल में 25 से 30 नए कछुओं ने भी जन्म लिया है। अधिकांश कछुए भारतीय नरम खोल (इंडियन सॉफ्ट सॉल) प्रजाति के हैं।
पांच एकड़ का तालाब बना कछुओं की शरणस्थली
सरपंच प्रतिनिधि जगतपाल गोदारा बताते हैं कि गांव काजलहेड़ी में 300 साल पहले से भी तालाब बना हुआ है। इस तालाब में पहले कुछ कछुए पला करते थे। धीरे-धीरे इन कछुओं की संख्या बढ़ती गई। फिलहाल पांच एकड़ से बड़े इस तालाब में करीब 200 से अधिक कछुए पल रहे हैं। पहले छोटे कछुओं को बंदर उठा ले जाते थे। एनपीसीआईएल ने कछुओं की सुरक्षा व्यवस्था करने के साथ ही यहां इंटरलॉकिंग रोड बनवा दी है। रिसर्च के लिए भवन भी बना दिया है।
ग्रामीण रमेश गोदारा बताते हैं कि इन कछुओं के बारे में जानकारी मिलने पर बाहर से भी लोग गांव काजलहेड़ी आते हैं। चंडीगढ़-दिल्ली से आने वाले बड़े सरकारी विभागों से लेकर निजी कंपनियों तक के अधिकारी यहां दौरा जरूर करते हैं। इसके अलावा सप्ताह के अंत में भी आसपास के लोग बच्चों को साथ लेकर कछुए देखने पहुंचते हैं।
नाथों का धुणा होने के कारण यहां हैं कछुए
फतेहाबाद के काजलहेड़ी के अलावा कुरुक्षेत्र के थाणा में इस तरह के कछुए मिलते हैं। इन दोनों स्थानों को सरकार ने सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र घोषित किया हुआ है। यहां इन कछुओं के होने का प्रमुख कारण तालाब के पास नाथों का धुणा होना है। ग्रामीण बताते हैं कि नाथ संप्रदाय के लोग गंगा नदी में स्थान करने जाते थे, उस समय कछुए साथ ले आते थे। धीरे-धीरे यहां कछुओं की संख्या बढ़ती गई।
गांव काजलहेड़ी के इस तालाब क्षेत्र को 2019 में श्री गुरु गोरखनाथ सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था। यहां बड़े-बड़े अधिकारी दौरा कर चुके हैं।
-विनोद कड़वासरा, मानद सदस्य, वन्य जीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो, भारत सरकार