कहने को ईएसआई अस्पताल केंद्र सरकार के अधीन आता है मगर यहां केयर के नाम पर मरीजों को कोई सुविधा नहीं है। अस्पताल में सुरक्षा के नाम पर भी कोई प्रबंध नहीं है। यहां तक कि इंसानों के अस्पताल में जानवर घूमते रहते हैं। आप एक बार अगर यहां आकर देखें तो यहां के बदतर इंतजाम के बारे में पता चलेगा। दवाएं मिल नहीं रही हैं। पीने के पानी का कोई इंतजाम नहीं है। हर वार्ड में कुत्ते घूमते हुए मिल जाएंगे। कुत्ते अस्पताल में न घुसें इसका कोई इंतजाम नहीं है। मानो यह इंसानों का नहीं, कुत्तों का अस्पताल है। मरीजों की भीड़ देखकर ऐसा लगता है कि जैसे सरकार और उसका तंत्र इन्हें इंसान समझते ही नहीं। पेश है संवाददाता ओम प्रकाश और फोटोग्राफर गौरव चौधरी की रिपोर्ट।
डॉक्टर और न दवा
- लगभग दो लाख बीमांकित व्यक्ति इस अस्पताल से जुड़े हुए हैं लेकिन न तो यहां डॉक्टर हैं और न ही दवा मिलती है। जबकि ईएसआई कॉरपोरेशन का अस्पताल कोई खैराती नहीं होता। यहां तो मालिक और कर्मचारी दोनों इलाज के लिए पैसे देते हैं।
यानी सरकार पैसे लेने के बाद भी दिन रात पसीना बहाने वाले कर्मचारियों और उनके परिवारों के इलाज की अनदेखी कर रही है। जब हमने इस बारे में अस्पताल के कुछ अधिकारियों से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि कुछ उच्चाधिकारियों की लड़ाई के कारण दवा खरीद पर ग्रहण लगा हुआ है।
अस्पताल में न तो अल्ट्रासाउंड हो रहा है और न ही किसी कागज पर दस्तखत। सिर्फ 16 स्थाई डॉक्टर हैं। जबकि 6 कांट्रेक्ट पर हैं जो सप्ताह में पांच दिन सिर्फ चार-चार घंटे काम करते हैं।
छह माह के पहले रिंबर्समेंट नहीं
- ईएसआई कॉरपोरेशन का नारा है चिंता से मुक्ति। लेकिन सुबह आठ बजे अस्पताल पहुंचें तो लाइन में लगा हर कर्मचारी इलाज की चिंता में डूबा हुआ होता है। अब इस अस्पताल में मरीजों की परेशानी और बढ़ने वाली है।
रेगुलर चलने वाली कोई दवा यहां नहीं मिलेगी। उसका रिम्बर्समेंट (प्रतिपूर्ति) लेना होगा। अस्पताल का फोकस सिर्फ इंडोर पर रहेगा। रिम्बर्स करवाने का मतलब मरीज को छह माह से पहले पैसा नहीं मिलेगा।
बिना तैयारी अपने अधीन क्यों लिया अस्पताल
- ईएसआई, ईपीएफ की लड़ाई लड़ने वाले श्रमिक नेता बेचू गिरी का कहना है कि हैंडओवर और टेकओवर के चक्कर में राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारी लड़ रहे हैं। इसकी वजह से मरीजों को न तो दवा मिल रही है और न ही डॉक्टर।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईएसआई कॉरपोरेशन ने बिना तैयारी के ही अस्पताल क्यों अपने अधीन लिया। यहां इस समय चिकित्सा अधीक्षक तक नहीं हैं। जबकि कोई भी काम उनके बिना नहीं हो सकता। राज्य सरकार ने अपने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अस्पताल से हटा लिए हैं जिसकी वजह से अंदर तक कुत्ते घूम रहे हैं।
‘एक सप्ताह में दवाईयां आ जाएंगी। उसके बाद मरीजों को कोई परेशानी नहीं होने दी जाएगी।’
-डॉ. असीम दास, डीन, ईएसआई मेडिकल कॉलेज