चरखी दादरी। 1984 में पापा पुलिस में सिपाही भर्ती हुए थे और 1988 में मैं पैदा हुआ तब पापा एसपी के गनमैन थे। थोड़ा बड़ा हुआ तो आईपीएस की पावर पता चल गई और उसी दौरान निर्णय लिया की आईपीएस ही बनना है। आईआईटी रुड़की में दाखिला लेकर लक्ष्य को पाने की तैयारी शुरू की और चार साल की मेहनत के बाद आईपीएस बनकर बचपन का सपना पूरा किया। बुधवार को जनता कॉलेज ऑडिटोरियम में अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से आयोजित पुलिस की पाठशाला कार्यक्रम में एक छात्रा की अपील पर चरखी दादरी पुलिस के कप्तान दीपक गहलावत ने अपने आईपीएस बनने के संघर्ष की कहानी साझा की।
दरअसल कार्यक्रम के तहत जब संवाद सेशन शुरू हुआ तो एक छात्रा ने एसपी दीपक गहलावत के समक्ष अपनी बात रखी। छात्रा ने कहा कि सर मैं आपके आईपीएस बनने तक का सफर जानना चाहती हूं। इस पर एसपी दीपक गहलावत ने सभागार में मौजूद करीब 600 विद्यार्थियों से उनकी राय पूछी तो उन्होंने भी हामी भर दी। इसके बाद एसपी दीपक गहलावत ने अपनी सफलता की कहानी मंच से सांझा की।
उन्होंने बताया कि मैं मूलरूप से सोनीपत का रहने वाला हूं पांचवीं कक्षा तक रोहतक के डीएवी स्कूल में पढ़ा। छठीं कक्षा में अभिभावकों ने मेरा दाखिला सैनिक स्कूल में करवा दिया। मुझे सैन्य अधिकारी नहीं बल्कि आईपीएस बनना था, इसलिए मैंने दसवीं के बाद सैनिक स्कूल छोड़ दिया। इसके बाद बारहवीं की और फिर आईटीआई रुड़की में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया। पहले साल से ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ आईपीएस की तैयार की। उस दौरान एक परिचित आईपीएस ऑफिसर ने मेरा मार्ग दर्शन किया और चार साल की कड़ी मेहनत के बाद आईपीएस बनने का सपना साकार कर लिया।
दो एकड़ ही थी जमीन, बचपन से स्पष्ट था लक्ष्य
एसपी दीपक गहलावत ने कहा कि परिवार के पास महज दो एकड़ जमीन थी और यह बचपन से स्पष्ट था कि जिंदगी अच्छे से व्यतीत करने के लिए नौकरी ही विकल्प है। उसी दौरान निर्णय लिया कि कामयाब होने के लिए मेहनत करूंगा। लक्ष्य बचपन से ही तय था और उसे पाने के लिए बस मेहनत करता गया।
संसाधनों और सुविधाओं की कमी झेलने वाले होते हैं अक्सर सफल
आईपीएस दीपक गहलावत ने संघर्ष की गाथा सांझा करते हुए कहा कि मैं किसी राजा-महाराजा के परिवार से नहीं था, जो मुझे कॅरिअर के लिए मार्ग दर्शन मिलता। बसों में दिल्ली तक सफर कर नोट्स बटोरे और अपने स्तर पर ही जानकारी जुटाकर तैयारी करता रहा। उन्होंने कहा कि संसाधनों और सुविधाओं की कमी झेलने वाले के कामयाब होने की संभावना ज्यादा है।