श्रीमद्भागवत का वाचन करते हुए गोबिंद कृष्ण शास्त्री।
चरखी दादरी। दादरी के बस स्टैंड के समीप स्थित दादी सती रानी मंदिर में श्रीमद् भागवत कथा सुनाते हुए गोबिंद कृष्ण शास्त्री ने कहा कि परमात्मा के निकट आने की ललक है तो अहम का त्याग कर देना चाहिए। समर्पण भाव से ही उस तीन लोक के स्वामी को पाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य भगवान की सबसे सुंदर कलाकृति है। मानव जन्म एक ऐसा है, जिस को पाने के लिए देवता भी तरसते रहते हैं। शास्त्री ने कहा कि भक्ति रस की प्राप्ति के लिए मनुष्य को आसन, श्वास, संगति एवं इंद्रियों पर जीत हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। यह भक्ति उपासना के भाव से आती है। उपासना का अर्थ है भगवान श्री कृष्ण या किसी जागृत संत के समीप बैठना। उपासना से आसन पर बैठने का अभ्यास हो जाता है।
वृंदावन से आए भागवत सुधाकर गोबिंद कृष्ण शास्त्री ने कहा कि एक-एक श्वास में परमात्मा का नाम होना चाहिए। इसलिए अपनी श्वास पर ध्यान धरिए। दर पे तुम्हारे आया, ठुकराओ या उठा लो... मधुर भजन सुनाते हुए उन्होंने कहा कि... मेरी जिंदगी ही बदल दी तुमने, जो जरा सा तेरा नाम लिया। उन्होंने कहा कि संग करना है तो अपने से बड़ों का करना चाहिए। भगवान से बढ़ कर इस सृष्टि में कोई नहीं है।
गोबिंद कृष्ण ने श्रद्धालुओं के समक्ष भक्ति भाव की सरस व्याख्या की। उन्होंने कहा कि साधक को अपनी पांच कर्म इंद्री और पांच ज्ञानेंद्रियों को शरीर व मन से हटा कर राधा की तरह भगवान की सेवा में लगाना चाहिए। उन्होंने भजन सुनाया राजी हैं हम उसी में, जिसमें तेरी रजा है।