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Charkhi Dadri News: रासायनिक खादों का प्रयोग बढ़ा, चने की खेती सिकुड़ी

Thu, 27 Nov 2025 10:42 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
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चरखी दादरी।
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चने की खेती के प्रति जिले के किसानों का रुझान कम हो गया है। तीन दशक पहले जिले में चना की बंपर पैदावार होती थी। गत कुछ सालों से फसलों में रासायनिक खादों के ज्यादा इस्तेमाल से चना की पैदावार ही कम हो गई है। जिले में कुल कृषि योग्य रकबा एक लाख 22 हजार 378 हेक्टेयर क्षेत्र है। 500 हेक्टेयर क्षेत्र में भी चने की खेती नहीं की जा रही है जबकि चने को शरीर के लिहाज से बेहद पौष्टिक एवं गुणकारी माना जाता है।
जिले का करीब 45 प्रतिशत क्षेत्र रेतीला है। चने की पैदावार खासकर बरानी एवं रेतीला एरिया मेंं अच्छी खासी होती रही है। अब तो रेतीला व बरानी क्षेत्र में किसान रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार चना ऐसी फसल है जिसमें रासायनिक खाद फायदा की बजाय नुकसान पहुंचाते हैं। चने के लिए देशी, जैविक खाद फायदेमंद होती है।
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जिले का इस समय 55 प्रतिशत एरिया तराई (सिंचाई युक्त) है। इस क्षेत्र में चना की खेती कतई नहीं हो रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार तराई एरिया में चना की पैदावार नहीं मिलती। चने को नाममात्र की ही सिंचाई की जरूरत होती है। किसान चांद सिंह, चंद्र सिंह,संजय कुमार व टेकराम का कहना है कि चना रासायनिक खाद व तराई क्षेत्र को नहीं मानता। इन किसानों ने बताया कि अब तो रबी सीजन में सरसों, गेहूं और खरीफ सीजन में बाजरा व धान की खेती ज्यादा की जाने लगी है।
चना है बेहद गुणकारी
चना मधुमेह के अलावा कई अन्य रोगों में लाभदायक है। यह दवा के रूप में काम आता है। चना खेत में अंकुरित होते ही खाने में इस्तेमाल होने लगता है। इसका हरा साग खाने में फायदेमंद है। हरा एवं अधपका दाना खाने में इस्तेमाल होता है। फसल पकने के बाद चने को गेहूं में मिलाकर आटा खाने से अनेक रोगों से छुटकारा मिलता है। चने से ही बेसन बनता है। बेसन से मिठाइयां व अनेक खाद्य पदार्थ बनते हैं।
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जिले की भूमि चने के उत्पादन के लायक नहीं रही। रासायनिक खाद के ज्यादा इस्तेमाल की वजह से इस फसल की पैदावार नहीं होता। चना को न तो रासायनिक खाद की जरूरत होती है और न ही इतनी सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।


- कृष्ण कुमार, एसडीओ कृषि विभाग।
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