पेज एक की एंंकर : शौक को बनाया कमाई का हथियार, पाया आर्थिक तंगी से पार
पॉजीटिव न्यूज : पहले शौक से करती थीं बुनाई, अब आय का साधन बनाईं
-पांच साल पहले बना स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने शुरू में किया संघर्ष, अब सकारात्मक परिणाम सामने
चरखी दादरी। जिस काम को करने का शौक हो, वही करने को मिल जाए तो फिर क्या कहने हैं। बस अपनी रुचि बनाए रखें और शुरुआत के संघर्षमय हालात के सामने घुटने न टेकें। ऐसा ही शहर के झाडूसिंह चौक क्षेत्र की रहने वाली महिलाओं ने करके दिखाया है। सारथी महिला मंडल स्वयं सहायता समूह पांच साल से शौक को आय का जरिया बनाकर समृद्धि की ओर अग्रसर है।
एक दिन समूह की प्रधान रेनू डाबरा घर पर ऊन से स्वेटर बना रही थीं। इसी दौरान शहर की एक गोशाला के संचालक वासुदेव आनंद किसी काम से उनके पास आए। उन्होंने रेनू का हुनर देखकर कहा कि यदि आप समूह बनाकर काम करेंगी तो अच्छी आमदनी होगी। आपके साथ ही अन्य महिलाएं भी स्वावलंबी बन सकेंगी। इसके बाद रेनू ने आसपास की महिलाओं से संपर्क कर उन्हें भी कार्य करने के लिए प्रेरित किया। साल 2019 में उन्होंने सारथी महिला मंडल स्वयं सहायता समूह की नींव डाली। इसके बाद से समूह की सदस्य बुनाई का कार्य कर आर्थिक तंगी से पार पाया। अब वे परिवार का सहारा बनी हैं।
शुरुआत में अनीता अरोड़ा, नीलम आहूजा, पुष्पा कालड़ा, मीनाक्षी गर्ग, रुचि, डिंपल, सुनीता, पूजा, नीलम प्रजापत, रचना चुटानी, गीता आर्य आदि समूह से जुड़ीं। शुरू में उन्हें इस कार्य में काफी संघर्ष करना पड़ा। लोग उनके उत्पाद देखकर मुंह फेरकर चले जाते थे। इसके बावजूद दो साल तक उन्हाेंने तन्मयता से काम जारी रखा। अब लोगों में स्वदेशी व पारंपरिक उत्पाद के प्रति जागरूकता बढ़ी है तो उनसे ऊनी कपड़ों की खरीदारी करते हैं। संवाद
- प्रतिमाह 25 से 30 हजार तक कर रहीं कमाई
अब सभी महिलाएं ऑर्डर लाती हैं। अपने हिसाब से कपड़े बनाती हैं। इससे उन्हें सर्दियों में अधिक कमाई होती है। गर्मियों में काम मंदा पड़ जाता है। बुनाई के कार्य से महिलाएं हर माह 25 से 30 हजार रुपये तक आमदनी करती हैं। ये बच्चों से बड़ों तक की जुराबें, स्वेटर, मफलर, इनर सेट, पोछा, चादर, तकिया, फ्रॉक, कान्हा ड्रेस आदि बनाती हैं।
- इस तरह करती हैं मिलकर काम
जब भी अधिक ऑर्डर आते हैं तो रेनू डाबरा महिलाओं को घर जाकर व क्रोशिया और ऊन दे आती हैं। साथ ही उनसे तय समय में बनाकर देने के लिए कहती हैं। सभी महिलाएं सप्ताह में एक बार बैठक करती हैं। इसमें वे आगामी योजना बनाती हैं। इसके अलावा, समूह की महिलाएं गीता महोत्सव और अन्य कार्यक्रमों में स्टॉल लगाकर अपने उत्पाद बेचती हैं।
महिलाओं की जुबानी, सफलता की कहानी
शादी से पहले ऊन से उत्पाद बनाने का शौक था। बाद में घर पर खाली रहती थी तो समय बिताने के लिए बनाती थी। अब यह शौक कमाई में तब्दील हो चुका है।
-रेनू डाबरा, प्रधान
बुनाई का शौक था। समूह की सूचना मिलने के बाद उनसे जुड़कर काम शुरू किया। आज घर के साथ अपना खर्च भी निकल रहा है। बहुत अच्छा लगता है।
-अनीता अरोड़ा, सचिव
अब बच्चों से रुपये मांगने की जरूरत नहीं पड़ती है। हर दिन कमाई होती है। ऑर्डर के अनुसार लोगों तक सामान पहुंचा रही हूं। शौक होने से कार्य में मन भी लगता है।
-पुष्पा कालड़ा, सदस्य
समूह से जुड़कर घर की आर्थिक स्थिति सुधरी है। आज किसी से रुपये मांगने की मोहताज नहीं हूं। बुनाई का कार्य करके आजीविका चलाने में सहायता मिल रही है।
-नीलम आहूजा, सदस्य
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दुकान में मौजूद सारथी महिला मंडल की सदस्य। संवाद
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रेनू डाबरा
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अनीता अरोड़ा
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पुष्पा कालड़ा
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नीलम आहूजा
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महिलाओं के ऊन से बनाए कपड़े। संवाद