रोजगार शुरू करने से पहले मुश्किल से निकलता था समूह की महिलाओं का घर खर्च, अब जीवन स्तर ऊपर उठा, बचत भी हो रही
- डॉ. आंबेडकर स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं 10 महिलाओं ने सिलाई कर संवारा भविष्य रबीन वर्मा/जगदीप सिंह
चरखी दादरी। नारी शक्ति अगर ठान ले तो कोई बाधा उसका मार्ग नहीं रोक सकती। ऐसा ही उदाहरण शहर के रविदास नगर की रहने वाली डॉ. आंबेडकर स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने प्रस्तुत किया है। इस समूह से जुड़ीं 10 महिलाओं ने अपने हाथ के हुनर से भविष्य संवारने के साथ ही परिवार का सहारा बनी हैं।
दरअसल, इस स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं सभी महिलाएं सिलाई में माहिर हैं। करीब सात साल पहले 10 महिलाओं ने यह समूह बनाया। इसके बाद शहरी आजीविका मिशन शाखा की मार्फत लोन के लिए आवेदन कर स्वरोजगार शुरू करने की इच्छा जाहिर की। टीसीओ सुरेश कुमार ने भी उन्हें प्रेरित किया। शुरुआत में उन्हें एक लाख की आर्थिक सहायता ऋण के तौर पर मिली। इस राशि से समूह की महिलाओं ने सिलाई मशीनें व अन्य संसाधन खरीदकर काम शुरू किया।
समूह में शामिल महिलाओं की मानें तो शुरुआती कुछ दिनों में काम कम रहा। इसके चलते ऋण की किस्त भरने की भी चिंता हुई। इसके बाद काम में थोड़ी तेजी आई। सभी महिलाओं ने एक लाख का ऋण भरने के बाद तीन लाख के ऋण के लिए आवेदन किया। पूर्व में लिए गए ऋण की नियमित अदायगी के चलते उन्हें तीन लाख का दूसरा लोन भी मिल गया। इस राशि से उन्होंने आधुनिक मशीनें खरीदीं, जिससे उनका काम में तेजी आई है। अब काम के दबाव में भी वे ऑर्डर लेने से इन्कार नहीं करती हैं।
स्वयं सहायता समूह की महिलाओं का कहना है कि दूसरा लोन चुकाने के बाद वे पांच लाख का तीसरा लोन लेकर काम को और आगे बढ़ाएंगी। ताकि, उनके परिवार का भविष्य और उज्ज्वल बन सके। संवाद
- ये हैं समूह की सदस्य
स्वयं सहायता समूह की प्रधान दर्शना देवी, उपप्रधान रीना, सचिव निर्मला देवी हैं। इसके अलावा रेखा देवी, ममता देवी, कोनिका, सुशीला, ज्योति, रजनी, नीलम आदि सदस्य हैं।
- घरेलू काम निपटाकर पहुंचती हैं काम करने
उपप्रधान रीना देवी के घर में अपना कार्यस्थल बना है। सभी महिलाएं घर का काम पूरा होने के बाद यहां आकर काम करती हैं। महिलाएं अब घरेलू कामों के साथ इसे दिनचर्या का हिस्सा बना चुकी हैं।
- यूं पूरे करती हैं ऑर्डर
इन महिलाओं ने बताया कि उनके पास तीन मशीनें हैं। इनमें तीन महिलाएं कपड़ों की सिलाई का काम करती हैं। तीन कटाई का काम करती हैं। वहीं, दो सिले हुए कपड़ों को सीधा और दो इस्त्री करती हैं। जब कोई महिला एक काम से थक जाती है तो अपना कार्य बदल लेती हैं। इससे उन्हें यह काम उबाऊ नहीं लगता। वे लगातार काम करती रहती हैं। इस कार्य से होने वाली आमदनी को वे समूह के खाते में जमा करती हैं। जब किसी को जरूरत होती है तब वे पैसे निकालती हैं। इन पैसों से वे लोन की किस्तें भी भरती हैं।
महिलाएं बोलीं : पहले था आमदनी का एक जरिया, अब हुए दो
- घर में पहले आमदनी का एक ही जरिया था, लेकिन, आज पति का दाहिना हाथ बन चुकी हूं। पहले मुश्किल से घर खर्च चल पाता था। अब हर माह घर खर्च आसानी से चलने के साथ थोड़ी बचत भी कर रहे हैं।
-रीना देवी, उपप्रधान
- समूह में जुड़ने के बाद घर का सारा कर्ज उतर चुका है। अब किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता। हाथ के हुनर से आत्मनिर्भर बनने की बेहद खुशी है। अब जीवन स्तर ऊपर उठने से परिवार भी खुश है।
-दर्शना देवी, प्रधान
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आर्थिक तंगी के कारण बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पा रही थी। पति की मजदूरी से केवल घर खर्च निकलता था। लेकिन, स्वरोजगार शुरू करने के बाद परिवार की आर्थिक हालत में काफी सुधार हुआ है। -रेखा देवी, सचिव
- इस महंगाई में अगर परिवार में एक ही कमाने वाला हो तो घर खर्च चलना मुश्किल है। इस स्थिति से परिवार को बचाने के लिए स्वयं सहायता समूह बनाकर काम शुरू किया, जिसके अब फायदे दिख रहे हैं।
-सुशीला देवी, खजांची
वर्सन:
छोटे समूह महिलाओं को समाज में सम्मान और रोजगार दे रहे हैं। गरीब तबके की महिलाएं इस तरह के समूह से जुड़कर आत्मसम्मान व रोजगार दोनों प्राप्त कर सकती हैं। आंबेडकर समूह भी आज सात साल की मेहनत से फलित हो रहा है।
-विनय जोशी, एनयूएलएम शाखा
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रविदास नगर में काम करतीं डॉ. आंबेडकर स्वयं सहायता समूह की महिलाएं। संवाद
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रीना देवी।
फोटो -05 दर्शना देवी।
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रेखा देवी।
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सुशीला देवी।