चरखी दादरी। वर्ष 1860 में बसे चंदेनी गांव ने देश सेवा के मामले में नजीर पेश की है। इस गांव ने देश को 5 स्वतंत्रता सेनानी, 13 कर्नल और 200 जवान दिए हैं। सरहदों की दुश्मनों से रक्षा करते हुए गांव के चार जवान शहीद भी हुए हैं। जबकि 1962 और 1971 के युद्ध में इस गांव के जवानों ने दुश्मनों का अंत किया है। चंदेनी दादरी जिले के झोझू खंड का गांव है। इस गांव में करीब 2200 मतदाता हैं जबकि जनसंख्या करीब 4500 है। इस गांव का देश को आजादी दिलाने और इसके बाद सशक्त भारत के निर्माण में अहम रोल रहा है। गांव के युवाओं में शुरुआत से ही देश सेवा का जज्बा रहा है। गांव निवासी राम सिंह, मीर सिंह, भगवान सिंह, श्रीचंद और गुरदयाल सिंह नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सेना आजाद हिंद फौज के सिपाही रह चुके हैं। हालांकि इन पांचों का देहांत हो चुका है।
इसके अलावा गांव निवासी सुखीचंद, हरपत, रामफल, अजायब सिंह, तोखाराम, सुरेश कुमार, समुंद्र, ओमप्रकाश, अजय, विजय, प्रदीप, प्रेमवीर और संजय अहलावत कर्नल के पद तक पहुंचे हैं। देश पर जब भी कोई भी आपदा आई है तो गांव के जवान उससे निपटने के लिए तैयार रहे हैं। फिर चाहे 1962 की लड़ाई हो या फिर 1971 का युद्ध, इस गांव के जांबाजों ने सदैव दुश्मनों का न केवल डटकर मुकाबला किया है, बल्कि उन्हें धूल भी चटाई है। मौजूदा समय में गांव के 200 युवा सेना में सिपाही से लेकर लेफ्टिनेंट के पद पर कार्यरत हैं। संवाद
- इन्होंने दी देश के लिए शहादत
वर्ष 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में सूबेदार होशियार सिंह ने उनके कई सैनिकों को मौत के घाट का उतारा था। इस युद्ध में दुश्मनों से मुकाबला करते हुए होशियार सिंह शहीद हो गए थे। उनकी शहादत के बाद सेना ने वीर चक्र दिया था। वहीं, पाकिस्तान के साथ वर्ष 1971 में बांग्लादेश को आजाद करवाने के लिए हुए युद्ध में गांव के हवलदार दयानंद ने अहम भूमिका निभाई थी। इस युद्ध में दयानंद दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। वहीं, 2004 में आतंकियों से मुकाबला करते हुए सिपाही सत्यवान शहीद हुए थे। जबकि 2005 में सेना के ऑपरेशन का हिस्सा रहे सूबेदार सुरेंद्र आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए थे।
- पूर्व मंत्री के परिवार ने पेश की मिसाल
प्रदेश के कैबिनेट मंत्री रह चुके सतपाल सांगवान भी चंदेनी गांव से हैं। उनके परिवार ने भी देश सेवा की मिसाल पेश की है। सतपाल सांगवान के बेटे सुनील सांगवान जेल अधीक्षक हैं जबकि पोता मन्नव सांगवान हाल ही में लेफ्टिनेंट बना है। उनके अलावा सतपाल सांगवान की पोती नव्या सेना की मेडिकल कोर में कैप्टन हैं।
पूर्व सैनिकों और शहीद वीरांगनाओं ने बताए बहादुरी के किस्से
- 1962 में चीन युद्ध के अलावा पाकिस्तान के साथ वर्ष 1965 व 1972 के युद्धों में भाग लिया है। दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया और उन्हें कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया। सरकार और सेना ने मुझे सम्मानित भी किया है।
-धर्मचंद, सेवानिवृत्त सूबेदार
- मेरे पति ने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया है। वो वर्ष 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में शहीद हो गए थे। उनकी शहादत के बाद सरकार ने उनकी वीरता को देखते हुए वीर चक्र से नवाजा था। उनकी शहादत का दिन मुझे आज भी याद है।
धनकौर, शहीद सूबेदार होशियार सिंह की पत्नी
गांव के युवा सेना में भर्ती होने के लिए सुबह शाम कड़ी मेहनत करते हैं। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज गांव का नाम देश व विदेशों में रोशन हो रहा है। गांव ने देश को कई स्वतंत्रता सेनानी, शहीद और सैन्य अधिकारी दिए हैं।
-राज सिंह, सरपंच, चंदेनी