गांव रामनगर के खेत में सरसों की फसल पर लगे फूल।
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चरखी दादरी। शीतलहर और पाला फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं जिससे फसलों में कई प्रकार की बीमारियां फैलने का खतरा बना रहता है। इनमें काला रतुआ, सफेद रतुआ, लेट ब्लाइट आदि रोग शामिल हैं। ये बात कृषि अधिकारी डॉ. कृष्ण कुमार ने कही।
उन्होंने बताया कि शीतलहर अंकुरण, वृद्धि, पुष्पण, उपज और भंडारण क्षमता में भी कई प्रकार की शारीरिक बाधाएं उत्पन्न करती हैं। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे फसलों को पाला व सर्दी से बचाने के लिए उचित उपाय करें।
ऐसे कर सकते हैं बचाव
डॉ. कृष्ण कुमार ने बताया कि बोर्डो मिश्रण या कॉपर ऑक्सी क्लोराइड फास्फोरस, पोटेशियम का छिड़काव कर जड़ों के बेहतर विकास को सक्रिय करें। शीतलहर के दौरान जहां भी संभव हो हल्की और बार-बार सतही सिंचाई का उपयोग करें (पानी की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होनी चाहिए)। यदि संभव हो तो स्प्रिंकलर सिंचाई का उपयोग करें (संघनन से आसपास के वातावरण में गर्मी पैदा होती है)। ठंड, पाला प्रतिरोधी पौधों, फसल, किस्मों की खेती करें।
ये उपाय भी अपनाएं
कृषि अधिकारी डॉ. कृष्ण कुमार ने बताया कि बागवानी और फलों के बागों में अंतर फसल खेती का उपयोग करें। टमाटर, बैंगन जैसी सब्जियों की मिश्रित खेती, साथ ही सरसों, अरहर जैसी लंबी फसलें उगाने से ठंडी हवाओं से आवश्यक सुरक्षा मिलेगी। उन्होंने कहा कि सर्दी के दौरान नर्सरी और छोटे फलों के पौधों को प्लास्टिक के ढक्कन, पुआल या सरकंडा घास आदि की छप्पर बनाकर विकिरण अवशोषण को बढ़ाएं और गर्म तापीय वातावरण प्रदान करें। थर्मल इंसूलेटिकल के लिए जैविक मल्चिंग का उपयोग करें। हवा के झटकों को कम करने लिए विंड बैंक, आश्रय बेल्ट लगाएं।