श्री दादी रानी सती मंदिर में वीरवार को आयोजित की गई श्रीमद्भागवत कथा
संवद न्यूज एजेंसी
चरखी दादरी। भगवान का आश्रय लेकर ही मनुष्य जीवन से पार पाया जा सकता है। ईश्वर के परमधाम में जाने को हर जीवात्मा उत्सुक रहती है, लेकिन, वहां उसी को स्थान मिलता है जिसने स्वयं को पूर्ण रूप से भगवान के श्रीचरणों में अर्पित कर दिया हो। श्रीमद्भागवत कथा पाठ करते हुए आचार्य गोविंद कृष्ण शास्त्री ने ये बातें कहीं।
बस स्टैंड के समीप श्री दादी रानी सती मंदिर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित को ऋषि ने श्राप दे दिया था कि सात दिन में उनकी मृत्यु हो जाएगी। ऐसे में व्याकुल हृदय लिए राजा परीक्षित ने विचार किया कि इन सात दिनों में किस प्रकार से इस जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति पाई जाए। जब इंसान को साक्षात काल दिखाई देता है तो उसका बेचैन हो जाना स्वाभाविक है। इस मुश्किल वक्त में केवल परमात्मा ही उसके मन को शांत कर सकते हैं।
यह भी सत्य है कि मनुष्य के प्राण जब एक स्वर से भगवान को पुकारते हैं तो हरि को आना ही पड़ता है। इस मुश्किल समय में राजा परीक्षित को शुकदेव मुनि के दर्शन हुए। शुकदेव मुनि को राजा की व्यथा का पता चला तो उन्होंने कहा कि वे सात दिन उनके पास बैठकर श्रीमद् भागवत को सुनें। इससे उनकी मुक्ति संभव है।
शुकदेव मुनि ने पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत सुनाना आरंभ किया। परीक्षित के साथ हस्तिनापुर के अनेक नर-नारियों ने भी सभा में इस अमृत कथा का श्रवण किया। जैसे ही शुकदेव मुनि ने इस कथा को सुनाना शुरू किया तो राजा परीक्षित अपनी प्रजा सहित भक्तिभाव में डूबने लगे और उनके मन से मृत्यु का भाव तिरोहित हो गया। शुकदेव मुनि ने बताया कि जीवों का उद्धार करने के लिए ही श्रीहरि भगवान विष्णु कृष्ण का अवतार लेकर इस धरती पर आए थे। कथा के दौरान अपने सरस भजनों से गोविंद कृष्ण शास्त्री ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
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श्री दादी रानी सती मंदिर में कथा करते आचार्य गोविंद कृष्ण शास्त्री। स्रोत : आयोजक
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श्रीमद्भागवत कथा में मौजूद श्रद्धालुगण। स्रोत : आयोजक