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हर साल 850 बच्चे लेते हैं जन्म, जिले में बाल रोग विशेषज्ञ है न एसएनसीयू यूनिट

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चरखी दादरी। जिले के विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों पर हर साल करीब 850 डिलिवरी होती हैं, लेकिन इसके बाद भी जिले में बाल रोग विशेषज्ञ है और न ही एसएनसीयू यूनिट है। इसका खामियाजा सीधे तौर पर बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। डिलिवरी के दौरान नवजात शिशु की तबीयत बिगड़ने पर जिला स्वास्थ्य विभाग के पास कोई खास संसाधन नहीं हैं और इसके चलते कई बार नवजात के परिजनों को दूसरे जिलों के अलावा निजी अस्पतालों की खाक छाननी पड़ती है। इसके अलावा जिले में गाइनी समेत स्टाफ नर्स के पद भी खाली हैं।
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प्रदेश सरकार पिछले करीब एक दशक से दादरी सिविल अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ तैनात नहीं कर पाई है, जबकि अब तक 30 से अधिक डिमांड मुख्यालय भेजी जा चुकी हैं। वहीं, स्टाफ नर्सों की कमी के चलते डिलिवरी हट की सेवाएं भी प्रभावित हैं। हर माह जिले में करीब 70 शिशु जन्म लेते हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं उस मुताबिक नहीं है। दादरी जिले में बच्चों और किशोरों की संख्या 70 हजार है, लेकिन इनके लिए एक भी बाल रोग विशेषज्ञ नहीं है। ऐसे में बच्चे बीमार होने पर परिजनों को निजी अस्पताल में जाकर जेब ढीली कर उपचार लेना पड़ रहा है।
सौ बेड का सिविल अस्पताल बने आठ साल से अधिक समय हो चुका है, लेकिन अब तक यहां चिकित्सकों की कमी दूर नहीं की गई है। जिले में चिकित्सकों के करीब 70 फीसदी पद खाली हैं और इनमें बाल रोग विशेषज्ञ भी शामिल हैं।
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- छह में से तीन गाइनी ही तैनात, एक ने दिया इस्तीफा
सिविल अस्पताल में तीन गाइनी तैनात हैं। इनमें से डॉ. बिंदू ने हाल ही में इस्तीफा दिया है जबकि डॉ. अनीता गुलिया के पास एसएमओ का चार्ज है और वर्कलोड के चलते वो ओपीडी कम ही देख पाती हैं। डॉ. शिल्पा बैनीवाल इस समय ओपीडी देख रही हैं। सितंबर में एसएमओ अनीता गुलिया रिटायर्ड होंगी जबकि डॉ. बिंदू का अगर इस्तीफा मंजूर होता है तो एक ही गाइनी डॉक्टर अस्पताल में बचेगी।
- निजी अस्पतालों में हर माह चुकाने पड़ते हैं करीब 20 लाख
शहर में मुख्य पांच अस्पतालों में छोटे बच्चों को उपचार के लिए इस समय ले जाया जा रहा है। विभागीय सूत्रों की मानें तो एक अस्पताल की दैनिक ओपीडी औसतन 40 रहती है और प्रति बच्चा ओपीडी फीस 150 से 170 रुपये निर्धारित है। इस दौरान कम से कम 200 रुपये की दवा भी दी जाती है। इस लिहाज से एक बार उपचार पर करीब 350 रुपये खर्च आता है। इस लिहाज से एक अस्पताल में प्रतिदिन 14 हजार और एक माह में करीब चार लाख बीस हजार की इनकम होती है। शहर में पांच अस्पताल हैं और इस लिहाज से उपचार के लिए प्रति माह वहां बच्चों के माता-पिता को करीबन 20 लाख रुपये चुकाने पड़ते हैं।
- शिक्षा और आवास की नहीं दिक्कतें
दादरी जिले में हर साल जन्म लेने वाले शिशुओं के लिए स्कूल पर्याप्त हैं, जबकि उन्हें आवास संबंधी दिक्कतें भी नहीं हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में अगर सुधार हो जाए तो सीधे तौर पर नवजात शिशुओं के परिजनों की परेशानियां कम होंगी। कई बार डिलिवरी के दौरान जच्चा-बच्चा की हालत बिगड़ने पर उन्हें रेफर करना पड़ता है।
वर्जन:
बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती की डिमांड हम हेड ऑफिस भेज चुके हैं। बाल-शिशु नर्सरी का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। जल्द ही सरकार सिविल अस्पताल में पीडिट्रिशियन की तैनाती कर देगी।
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- डॉ. संजय गुप्ता, डिप्टी सीएमओ।
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