- खेतों में पराली जलाने के मामले कम हुए लेकिन मामले शून्य तक लाना चुनाैतीपूर्ण
- सरकार इस बार खेतों में पराली न जलाने वालों को 1200 रुपये प्रति एकड़ अनुदान देगी
अरुण शर्मा
चंडीगढ़। हरियाणा के किसानों में जागरूकता आने के कारण पराली जलने से दम घोटने वाले धुएं से थोड़ी राहत मिली है लेकिन अभी मंजिल दूर है। पूरी तरह से धुएं से छुटकारा पाना चुनाैतीपूर्ण है। हरियाणा में पराली जलने के कारण 12 से अधिक जिले पूरी तरह से वायु प्रदूषण की चपेट में आ जाते हैं और कई शहरों में तो सांस लेना भी दुश्वार हो जाता है। पराली जलाने वालों के खिलाफ सख्ती जारी है लेकिन बिना जागरूकता के इसे रोकना संभव नहीं है।
हर साल 15 सितंबर से 30 नवंबर के बीच प्रदेश में पराली जलाने के मामले सामने आते हैं। पराली जलाने के मामलों की पिछले सालों से तुलना करें तो अधिकतर जिलों में केस घटे हैं लेकिन कुछ में बढ़े भी हैं। 2020 में अंबाला में पराली जलाने के 346 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2024 में केवल 99 रह गए। फतेहाबाद में 2020 में 880 मामले थे लेकिन बीते वर्ष इनकी संख्या घटकर 130 रह गई।
कैथल में 2020 में 840 मामले सामने आए थे और 2024 में 194 केस पकड़े गए। करनाल में 2020 में 592 मामले थे जोकि पिछले वर्ष 132 तक रह गए। जींद में 2020 में 347 तक मामले दर्ज किए थे और 2024 में 218 ही रह गए। वहीं, भिवानी, फरीदाबाद और पंचकूला में मामले बढ़े हैं। भिवानी में 2020 में 5 मामले पकड़े गए थे। 2024 में 10 केस चिह्नित किए गए। फरीदाबाद में 2020 में पराली जलाने का केवल 1 मामला था लेकिन पिछले वर्ष यहां 47 मामले सामने आए। पंचकूला में पराली जलाने के पिछले वर्ष 19 मामले सामने आए थे जबकि 2020 से 2022 तक एक भी केस चिह्नित नहीं किया गया था।
2024 में 40 दिन से अधिक रहा था असर
2024 में फतेहाबाद, अंबाला, हिसार, जींद, कैथल, कुरुक्षेत्र, पानीपत, रोहतक, सिरसा, सोनीपत, यमुनानगर, करनाल और झज्जर जिलों में पराली जलाने के सर्वाधिक मामले सामने आए थे। छह शहरों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 300 को पार कर गया था। नवंबर 2024 में पानीपत में 370, रोहतक में 303, जींद में 321, बल्लभगढ़ में 307, गुरुग्राम में 321, दादरी में 307 तक एक्यूआई दर्ज किया गया था। पराली जलाने का असर कई शहरों में 30 दिनों तक रहा था जबकि प्रदेश के 10 शहरों में 40 दिनों तक असर देखने को मिला था।
430 करोड़ रुपये अनुदान देने का लक्ष्य
दो वर्ष पहले तक सरकार खेत में ही पराली खपाने के लिए अनुदान देती थी। इसी तरह से खेत के बाहर यानी उद्योगों, गोशालाओं आदि में इसके उपयोग को लेकर सरकार अनुदान देती थी। 2024 तक पराली प्रबंधन के लिए 1000 रुपये प्रति एकड़ तक अनुदान मिलता था। 2025 से सरकार ने तय कर दिया है कि खेत के अंदर या बाहर किसान पराली का प्रबंधन करे या न करे लेकिन पराली न जलाने वालों को सरकार 1200 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से अनुदान देगी। 2025-26 में सरकार ने 430 करोड़ रुपये अनुदान देने का लक्ष्य तय किया है।
आमजन पोर्टल पर कर सकेंगे शिकायत
हरियाणा कृषि एवं कल्याण विभाग के निदेशक राजनारायण काैशिक ने बताया कि पराली जलाने वालों के खिलाफ आमजन कृषि एवं कल्याण विभाग के पोर्टल पर फोटो के साथ शिकायतें कर सकेंगे। एक सप्ताह में यह पोर्टल काम करने लगेगा। पराली जलाने वालों पर इस बार रेड एंट्री, एफआईआर और जुर्माना भी लगाया जाएगा। इसके अलावा पराली जलाने वाले किसान की फसल दो साल तक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जाएगी। रेड व यलो जोन में शामिल गांवों में पराली जलाने वालों की निगरानी के लिए नोडल अधिकारियों का एक एप जल्द संचालित होगा। इस पर धान की बिजाई का पंजीकरण कराने वाले किसानों का ब्योरा भी होगा। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) भी इस बार किस खेत में पराली जली इसका ब्योरा उपलब्ध कराएगा। इसलिए जिस खेत में पराली जलेगी उन खेतों के किसानों की रेड एंट्री की जाएगी।
पराली प्रबंधन का बढ़ता दायरा
वर्ष
धान का रकबा
पराली जली
पराली उत्पादन
पराली प्रबंधन
2020
3768276.91
4202
160000
80000
2021
3788043
6987
500000
250000
2022
410433.69
3661
1400000
700000
2023
4390978.43
2303
2400000
1200000
2024
4539226.88
1486
4000000.6
2000000.3
स्रोत : कृषि एवं कल्याण विभाग। धान का रकबा और पराली प्रबंधन एकड़ में है जबकि पराली जली और पराली उत्पादन मीट्रिक टन में है।