कोर्ट ने माना कि पति घर में रहते हुए भी पत्नी से संवाद करने या बच्चों के पालन-पोषण में रुचि नहीं लेता था। हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक विवादों का सबसे अधिक बोझ बच्चों पर पड़ता है। इसलिए अदालतों को तकनीकी दृष्टिकोण से हटकर ऐसे मामलों का निपटारा इस तरह करना चाहिए कि सभी पक्षों के हित में न्याय हो।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा मामलों पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऐसे मामलों में अदालतों को शिकायत का आकलन करते समय बेहद संवेदनशील होना चाहिए। प्रमाण के मानक बेहद कठोर नहीं होने चाहिए। अधिकतर उत्पीड़न घर की चारदीवारी के भीतर होता है और पीड़िताओं के लिए इसे साबित करना बेहद कठिन होता है।
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जस्टिस कीर्ति सिंह ने कहा कि घरेलू हिंसा मामलों में प्रमाण का मानक उतना कठोर नहीं हो सकता। अदालतों को सभी संभावनाओं के आधार पर यह तय करना चाहिए कि लगाए गए आरोपों में दम है या नहीं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 घरेलू हिंसा की परिभाषा को सीमित नहीं करता बल्कि इसमें शारीरिक, यौन, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक और यहां तक कि आर्थिक हिंसा को भी शामिल किया गया है। कोर्ट ने कहा कि आर्थिक शोषण का अर्थ है वैधानिक या पारंपरिक अधिकार से मिलने वाले संसाधनों से वंचित करना, चाहे वह अदालत के आदेश से देय हो या आवश्यकता से जुड़ा हो।
जस्टिस कीर्ति सिंह ने आदेश में कहा कि अधिनियम की धारा 20 के तहत पत्नी और बच्चों को भरण-पोषण व अन्य आर्थिक सहायता दिलाई जा सकती है ताकि वे अपने जीवनस्तर के अनुरूप रह सकें। निचली अदालत ने पत्नी को पीड़िता मानते हुए भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न का शिकार ठहराया।
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कोर्ट ने माना कि पति घर में रहते हुए भी पत्नी से संवाद करने या बच्चों के पालन-पोषण में रुचि नहीं लेता था। हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक विवादों का सबसे अधिक बोझ बच्चों पर पड़ता है। इसलिए अदालतों को तकनीकी दृष्टिकोण से हटकर ऐसे मामलों का निपटारा इस तरह करना चाहिए कि सभी पक्षों के हित में न्याय हो। कोर्ट ने गुरुग्राम की अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए पत्नी और दो बेटियों के लिए मासिक भरण-पोषण एवं आवास सहायता को सही ठहराया। आदेश के तहत पत्नी और बच्चों को 40,000 रुपये मासिक आवास सहायता और बेटियों को 20,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण मिलेगा।