-इसे मंजूरी देना लोक सेवकों को अनुचित अभियोजन से बचाने के ढांचे को नुकसान पहुंचाएगा
-सीबीआई पंचकूला कोर्ट के जारी किए गए समन आदेश को हाईकोर्ट ने किया रद्द
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी लोक सेवक के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी गई है, तो उस पर आपराधिक षडयंत्र के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। सचिन अहलावत नामक व्यक्ति ने याचिका दायर कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और आईपीसी की धारा 120-बी के तहत दर्ज केस में सीबीआई कोर्ट द्वारा पारित संज्ञान आदेश और समन आदेश को रद्द करने की मांग की थी। मामला रोहतक से जुड़ा हुआ है जहां रिश्वत के सीधे आरोपों को लेकर सीबीआई ने केस दर्ज किया था। इस मामले में सीबीआई को अभियोजन की मंजूरी नहीं मिली थी। हाईकोर्ट ने पंचकूला के सीबीआई कोर्ट के जारी किए गए समन आदेश को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया।
याची ने कहा कि पीसी एक्ट की धारा 19 के तहत पूर्व मंजूरी के बिना ट्रायल कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेने में गलती की है। हाईकोर्ट ने कहा, एक लोक सेवक, जिसके संबंध में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत केस चलाने की अनुमति नहीं दी गई है, उसके विरुद्ध केवल भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो यह अपराध के लिए अप्रत्यक्ष अभियोजन के समान है, जो अन्यथा कानून द्वारा वर्जित है। सीबीआई ने स्वीकार किया कि कथित साजिश पूरी तरह से अवैध रिश्वत की कथित मांग से संबंधित है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मंजूरी के प्रावधान को नकारने से स्पष्ट विधायी मंशा कमजोर होगी तथा लोक सेवकों को अनुचित अभियोजन से बचाने के लिए बनाए गए सुरक्षात्मक ढांचे को नुकसान पहुंचेगा।