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Chandigarh-Haryana News: पंजाब चुनाव से पहले एसवाईएल पर सियासी सौहार्द, भाजपा-आप की परीक्षा

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आशीष वर्मा
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चंडीगढ़। सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर पर सौहार्दपूर्ण तरीके से समाधान निकालने की हालिया पहल को पंजाब विधानसभा चुनाव के संदर्भ में देखा जा रहा है। वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के लिए भी बहुत कुछ दांव पर लगा है।
भाजपा को इस बार पंजाब में हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के रूप में एक उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है। पिछले कुछ महीनों से मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी लगातार पंजाब का दौरा कर रहे हैं और भाजपा के चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। पार्टी सूत्रों का दावा है कि उन्हें वहां अच्छा जनसमर्थन भी मिल रहा है। आने वाले दिनों में उनके दौरे और बढ़ने की संभावना है। चुनावी दौर में उनसे एसवाईएल मुद्दे पर सवाल उठना तय माना जा रहा है। ऐसे में उनके जवाब और रुख को लेकर सियासी हलकों में चर्चा तेज है।
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इसी को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री सैनी ने एसवाईएल पर अब तक की बैठकों में एक जैसा संतुलित और नरम रुख अपनाया है। इससे पहले पांच अगस्त 2025 को हुई बैठक में भी उन्होंने दोनों राज्यों के बीच सौहार्दपूर्ण माहौल में बातचीत होने की बात कही थी। हालिया बैठक में भी उनका बयान इसी तर्ज पर रहा। जानकारों का मानना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी से बचते हुए अधिकारियों को आगे करने की यह एक सोची-समझी रणनीति है।
दूसरी ओर, पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के लिए यह चुनाव राजनीतिक रूप से ‘करो या मरो’ की स्थिति वाला है। इसी बीच यह पहली बार देखा गया है जब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने सार्वजनिक रूप से जल बंटवारे के मुद्दे पर अपेक्षाकृत नरम बयान दिया है। उनके इस रुख पर शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कड़ी आपत्ति जताई है।
बादल ने कहा कि यह पंजाब के नदी जल अधिकारों का सवाल है, दान का नहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि भगवंत मान पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री दरबारा सिंह के नक्शेकदम पर चल रहे हैं, जिन्होंने इंदिरा गांधी के सामने सरेंडर कर दिया था। अकाली दल इस तरह के किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं करेगा। इन तमाम सियासी बयानों के बीच बड़ा सवाल यही है कि क्या दशकों से चले आ रहे इस विवाद का कोई ठोस समाधान निकल पाएगा। वर्ष 2020 से अब तक दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच सात बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। इस मामले की अगली सुनवाई आठ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में होनी है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि तब तक अधिकारियों के स्तर पर कोई ठोस सहमति बन पाती है या नहीं।
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एसवाईएल नहर का मुद्दा पिछले करीब छह दशकों से लंबित है। हरियाणा ने अपने हिस्से की नहर का निर्माण पूरा कर लिया है, जबकि पंजाब ने अब तक नहर का निर्माण नहीं किया है। पंजाब सरकार का स्पष्ट रुख है कि जब तक पानी के बंटवारे पर स्पष्ट और न्यायसंगत फैसला नहीं होता, तब तक नहर निर्माण का कोई औचित्य नहीं है।
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