- कर्मचारियों के प्रति निष्पक्षता व उनकी सुरक्षा राजधर्म, दायित्व से पीछे नहीं हट सकते: हाईकोर्ट
- दर्जनों याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने नियमित न करने को माना अनुचित
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने दो दशक से अधिक समय से कार्यरत दैनिक वेतन, संविदा और अस्थायी कर्मचारियों के हक में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि कर्मचारियों के प्रति निष्पक्षता व उनकी सुरक्षा सरकार का राजधर्म है और इस दायित्व से पीछे नहीं हटा जा सकता है। कोर्ट ने कर्मियों को नियमित करने का आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि सरकार सालों तक कर्मचारियों से काम लेकर उन्हें नियमित करने से इनकार नहीं कर सकती।
जस्टिस संदीप मौदगिल की एकल पीठ ने हरियाणा सरकार के खिलाफ दायर 41 याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाते हुए कहा कि 10 साल से अधिक समय तक सेवा दे चुके कर्मचारियों को नियमित किया जाना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता वर्ष 1994 से विभिन्न विभागों में दैनिक वेतन, वर्क-चार्ज या अस्थायी आधार पर कार्यरत थे। उन्होंने सरकार की वर्ष 1993, 1996, 2003 व 2011 की नियमितीकरण नीतियों के तहत नियमित करने की मांग की थी, लेकिन सरकार ने उनकी मांगों पर कोई निर्णय नहीं लिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार वर्षों तक कर्मचारियों से लगातार काम लेकर उन्हें अस्थायी बताकर शोषण नहीं कर सकती। लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को नियमित न करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। सरकार यह नहीं कह सकती कि पद स्वीकृत नहीं है जब उसने वर्षों तक उन्हीं कर्मचारियों से कार्य लिया हो। अस्थायी, दैनिक वेतन या संविदा जैसे शब्दों का प्रयोग कर कर्मचारियों के अधिकार छीने नहीं जा सकते। राज्य कल्याणकारी संस्था है, वह कर्मचारियों का शोषण नहीं कर सकती। वर्षों तक सेवा लेने के बाद उन्हें अनिश्चितता में छोड़ना अन्याय है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि सभी पात्र कर्मचारियों को नियमित किया जाए और बकाया वेतन व अन्य लाभ 6% ब्याज के साथ दिए जाएं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया 8 सप्ताह के भीतर पूरी की जाए।
यह आदेश उन सभी कर्मचारियों पर लागू होगा जिन्होंने 10 साल या उससे अधिक सेवा दी है, सेवाएं लगातार ली जाती रहीं और कार्य स्थायी प्रकृति का था।