कर्ज में डूबे और स्थायी रोजगार भी नहीं
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. दारा सिंह और संजीव कुमार के अध्ययन में कृषि मजदूरों की खराब स्थिति सामने आई है। 480 कृषि मजदूरों पर आधारित इस अध्ययन के अनुसार करीब 61 प्रतिशत मजदूरों के पास अपनी जमीन नहीं है। आधे से अधिक परिवारों की मासिक आय करीब पांच हजार रुपये है। अध्ययन में सामने आया कि करीब 56 प्रतिशत मजदूर किसी न किसी प्रकार के कर्ज में डूबे हैं। यह कर्ज मुख्य रूप से इलाज, सामाजिक कार्यक्रमों और पुराने कर्ज को चुकाने के लिए लिया गया।
करीब 20 प्रतिशत मजदूरों पर 25 हजार रुपये तक और कुछ पर एक लाख रुपये से अधिक का कर्ज है। शोध के अनुसार करीब 30 प्रतिशत मजदूर कोई बचत नहीं कर पाते और आधे मजदूर अपनी आय का 70 प्रतिशत हिस्सा केवल बुनियादी जरूरतों पर खर्च कर देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि मजदूरों को पूरे साल काम नहीं मिलता। मानसून की विफलता और ऑफ-सीजन में लंबे समय तक बेरोजगारी बनी रहती है। कृषि क्षेत्र में मशीनों के बढ़ते उपयोग से मजदूरों की मांग और मजदूरी दोनों प्रभावित हुई हैं। शोधकर्ताओं ने सरकार को वीबी-जीरामजी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन, आसान ऋण सुविधा, स्वरोजगार प्रशिक्षण, वैकल्पिक रोजगार और समान काम के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने जैसे सुझाव दिए हैं।
काम मिलने की दरकार
किसानों की हालत अच्छी नहीं है। कृषि मजदूरों की हालत तो और ज्यादा दयनीय है। उनका काफी शोषण होता है। उनकी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। इतनी महंगाई में वे कैसे जीवन यापन करते हैं सोचने की बात है। सरकार ने मनरेगा बंद कर दी है। अब नई योजना में कैसे कृषि मजदूरों को काम मिलता है यह देखने वाली बात होगी। - देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ
कपास बेल्ट में स्थिति खराब
हरियाणा की कपास बेल्ट में सबसे ज्यादा कृषि मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं। इन्हें न तो न्यूनतम मजदूरी मिलती है और न पूरे साल काम। इसकी वजह से ये कर्जदार हो जाते हैं और बाद में आत्महत्या कर लेते हैं। हमारी सरकार से मांग है कि इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करे और इनकी न्यूनतम मजदूरी 700 रुपये की जाए और पूरे साल काम दिलवाया जाए। -जगमाल सिंह, प्रधान खेत मजदूर यूनियन हरियाणा