-हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म व हत्या के दोषी की फांसी को 30 साल की सजा में बदला
-मां को सुनाई गई 7 साल की सजा के आदेश को हाईकोर्ट ने किया रद्द
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पलवल में बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारे देश में मां की बेटे को राजा बेटा मानने की प्रवृति है फिर भले ही बेटा अपराधी क्यों न हो। कोर्ट ने कहा कि यह प्रवृत्ति समाज के लिए खतरनाक है। कोर्ट ने इस मामले में दोषी पाए गए युवक की मृत्युदंड की सजा को घटाकर 30 साल के कठोर कारावास में बदलते हुए 30 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है जो पीड़ित बच्ची के परिवार को दिया जाएगा। कोर्ट ने मां को साक्ष्य छुपाने के लिए सुनाई गई 7 साल की सजा को रद्द कर दिया है।
अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि भारत के कई हिस्सों में परिवार विशेषकर माताएं अपने बेटों को चाहे वे कितने ही अपराधी क्यों न हों आंख मूंदकर बचाने की कोशिश करती हैं और यह सोच समाज के लिए खतरनाक है। अदालत ने इसे पितृसत्तात्मक सोच का घातक परिणाम बताया और कहा कि ऐसी मानसिकता अपराध को बढ़ावा देती है। घटना 31 मई 2018 की है। मृतका के पिता एक छोटे स्तर पर टेंट लगाने का काम करते थे। आरोपी पिछले 5–6 वर्षों से उनके साथ काम कर रहा था। घटना वाले दिन आरोपी बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने घर ले गया जहां उसने उसके साथ दुष्कर्म किया और बाद में हत्या कर रसोई में रखे एक बड़े कंटेनर में शव छिपा दिया।
उस समय आरोपी की मां घर से बाहर गई हुई थी। बाद में ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने बच्ची को आरोपी के साथ जाते देखा था। पास के एक स्कूल में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में भी आरोपी बच्ची का हाथ पकड़कर उसे ले जाता हुआ दिखा। जब परिजन आरोपी के घर पहुंचे तो उसकी मां ने बच्ची और आरोपी की मौजूदगी से इनकार किया और घर में घुसने से रोका। बाद में परिजनों को आंगन में रखा एक कंटेनर संदिग्ध लगा जिसमें बच्ची का शव मिला। 24 जनवरी 2020 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा और उसकी मां को साक्ष्य छुपाने के लिए 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने मां को सभी आरोपों से बरी करते हुए कहा कि मां ने अपने राजा बेटे को बचाने की कोशिश जरूर की जो नैतिक रूप से निंदनीय है।