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Chandigarh-Haryana News: मां-पिता की जिम्मेदारी के नाम पर पत्नी के भरण पोषण से नहीं बचा जा सकता

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अमर उजाला ब्यूरो
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चंडीगढ़। पत्नी व बच्चों के लिए भरण पोषण राशि पर अहम आदेश जारी करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऋण की किश्त या माता-पिता की जिम्मेदारी का हवाला देकर पति अपने दायित्व से नहीं बच सकता है।
अदालत ने रेवाड़ी फैमिली कोर्ट द्वारा तय 25 हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम गुजारा भत्ता देने को उचित ठहराते हुए पति की अपील खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि याची पत्नी की आय को लेकर कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सका।
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जस्टिस गुरविंदर सिंह गिल और जस्टिस रमेश कुमारी की खंडपीठ ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि जब तक तलाक याचिका लंबित है तब तक पत्नी और उसके साथ रह रही नाबालिग बेटी के गुजारा भत्ते के लिए अंतरिम सहायता आवश्यक है। पति ने फैमिली कोर्ट के 13 जुलाई 2022 के आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे पत्नी को 25 हजार रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया गया था। पति का तर्क था कि वह हरियाणा के सरकारी काॅलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है और उसकी मासिक आय लगभग 75 हजार रुपये है।
यह भी कहा कि वह 28 लाख रुपये के ऋण की किश्तें, बेटे की पढ़ाई, बीमार माता-पिता का खर्च और बेटी के खाते में राशि जमा करने जैसे कई आर्थिक दायित्व निभा रहा है। इसके अलावा पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी उच्च शिक्षित (एमएससी व बीएड) है और ट्यूशन पढ़ाकर 40-50 हजार रुपये प्रतिमाह कमा रही है इसलिए उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया जाना चाहिए।
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साथ ही यह भी दलील दी थी कि पत्नी ने उसके खिलाफ झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराया था जिसमें वह बरी हो चुका है। पत्नी की ओर से दलील दी गई कि वह कहीं नौकरी नहीं करती और अपनी नाबालिग बेटी के पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी उसके ऊपर है। ट्यूशन से आय के दावे को भी नकारते हुए कहा था कि उसके पास नियमित आय का कोई ठोस स्रोत नहीं है।
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