-हरियाणा परिवहन विभाग में कंडक्टर की याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट का आदेश
-दहेज उत्पीड़न के मामले के चलते रहा था गैर मौजूद, बाद में हुआ था बरी
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि कोई कर्मचारी आपराधिक मामले में फंसे होने के कारण ड्यूटी से अनुपस्थित रहा हो, भले ही बाद में वह सभी आरोपों से बरी हो जाए राज्य सरकार को पूरा अधिकार है कि वह उस अवधि का वेतन रोके। कर्मचारी की सेवाएं कानूनी कारणों से उपलब्ध नहीं थीं, तो उस अवधि के लिए वेतन देना विभाग की जिम्मेदारी नहीं बनती।
हरियाणा परिवहन विभाग में कंडक्टर रहे बलवंत सिंह ने याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि उस पर 1991 में दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्या के आरोप में केस दर्ज हुआ था। इस मामले में उसे दोषी मान अदालत ने सात साल की सजा सुनाई थी और इसी आधार पर उसे विभाग ने बर्खास्त कर दिया था। आदेश के खिलाफ अपील में हाईकोर्ट ने उसे बरी कर दिया था। हाईकोर्ट से बरी होने के बाद विभाग ने उसे सेवा में बहाल कर दिया था। बहाली आदेश में यह साफ लिखा गया कि बलवंत सिंह को उस अवधि का वेतन नहीं मिलेगा जब वे सेवा से बाहर थे। इस पर उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया और आग्रह किया कि उन्हें बरी हो जाने के बाद पूरी सैलरी और भत्ते मिलने चाहिए। सरकार की ओर से दलील दी गई कि चूंकि बलवंत सिंह की सेवा समाप्ति एक वैध न्यायिक सजा के कारण हुई थी, इसलिए उस अवधि के लिए वेतन देने का कोई औचित्य नहीं बनता। हाईकोर्ट ने सरकार के पक्ष को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी और कहा कि विभाग को उस अवधि के लिए वेतन देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जब कर्मचारी सेवा में नहीं था।