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गलती संस्थान की तो खामियाजा कर्मचारी को नहीं भुगतने दिया जा सकता : हाईकोर्ट

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- दोष सिद्धि पर अदालती रोक के बावजूद कर्मचारी को किया गया बर्खास्त
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- दिव्यांग कर्मचारी को पूरा वेतन और भत्ते देने का हाईकोर्ट ने जारी किया आदेश


चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को संस्थान की गलती के कारण सेवा से बाहर रखा गया हो तो उसे उस अवधि के वेतन और भत्तों से वंचित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि दोष सिद्धि पर रोक के बावजूद की गई बर्खास्तगी अवैध है और ऐसे मामलों में काम नहीं तो वेतन नहीं का सिद्धांत लागू नहीं होता।

मामला हरदेव सिंह सोढ़ी से संबंधित है जो 75 प्रतिशत से अधिक दिव्यांग हैं। उन्हें वर्ष 2001 में दिव्यांग कोटा के तहत ब्लॉक विकास व पंचायत अधिकारी नियुक्त किया गया था। वर्ष 2004 में उनके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई। ट्रायल कोर्ट ने 2012 में उन्हें दोषी ठहराते हुए दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है लेकिन 11 मार्च 2014 को अपीलीय अदालत ने उनकी दोष सिद्धि और सजा पर रोक लगा दी।
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इसके बावजूद, 30 अप्रैल 2014 को बिना किसी विभागीय कार्यवाही के और इस तथ्य की अनदेखी करते हुए कि दोष सिद्धि पर रोक लगी हुई थी याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इस बर्खास्तगी को चुनौती दिए जाने पर वर्ष 2017 में हाईकोर्ट ने आदेश रद्द कर राज्य सरकार को मामले में पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।



पुनर्विचार के बाद सक्षम प्राधिकारी ने दोष सिद्धि पर रोक और दिव्यांग कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए 17 अक्तूबर 2018 को नया आदेश पारित किया। इसमें याचिकाकर्ता को 31 मई 2015 तक पूर्ण सेवा लाभों के साथ बहाल किया गया जो उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि थी।

हालांकि, बाद में बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए 21 नवंबर 2019 को उस आदेश की समीक्षा कर उसे पलट दिया। कोई काम नहीं, कोई वेतन नहीं का हवाला देते हुए मध्यवर्ती अवधि के वेतन का भुगतान करने से इनकार कर दिया गया। हाईकोर्ट ने इस कदम को अवैध और मनमाना करार दिया।
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अदालत ने याचिकाकर्ता की ग्रेच्युटी, पेंशन और अवकाश नकदीकरण के भुगतान में पांच से छह वर्ष की अत्यधिक देरी पर भी कड़ी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति नमित कुमार ने कहा कि राज्य की ओर से देय राशि को अनुचित रूप से रोके रखने पर याचिकाकर्ता को ब्याज के रूप में मुआवजा दिया जाना चाहिए। अदालत ने 21 नवंबर 2019 के विवादित आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को एक जून 2014 से 31 मई 2015 तक की अवधि के लिए पूरा वेतन और भत्ते दिए जाएं जिस पर सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
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