अदालत ने कहा कि हर कैदी के मामले का आकलन उसके अपने आचरण और उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री के आधार पर होना चाहिए। केवल अनुमान या आशंका के आधार पर पैरोल रोकना उचित नहीं है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी कैदी को उसके सह-अभियुक्त के आचरण के लिए जिम्मेदार ठहराकर पैरोल जैसे वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
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अदालत ने कहा कि केवल यह आशंका जताना कि कैदी के जेल से बाहर आने पर शांति भंग हो सकती है, पैरोल खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे ठोस और विश्वसनीय सामग्री होना जरूरी है।
राहुल की याचिका पर सुनवाई करते हुए करनाल के मंडलायुक्त का 15 जुलाई 2026 का आदेश रद्द कर दिया। इस आदेश के जरिये राहुल की 10 सप्ताह की पैरोल अर्जी खारिज की गई थी। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर उसकी अर्जी पर कानून के अनुसार नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया।
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राहुल हत्या समेत गंभीर धाराओं में उम्रकैद की सजा काट रहा है। सोनीपत के गन्नौर थाने में दिसंबर 2016 में दर्ज मामले में उसे 2018 में दोषी ठहराया गया था। उसकी अपील हाईकोर्ट में लंबित है। परिवार की जिम्मेदारियों और सामाजिक संबंधों के लिए उसने 10 सप्ताह की नियमित पैरोल मांगी थी।
प्रशासन ने अर्जी खारिज करते समय उसके खिलाफ दर्ज छह मामलों और सह-अभियुक्त गोपाल उर्फ गोपी के आचरण को भी आधार बनाया। गोपी 40 दिन की पैरोल पर बाहर जाने के बाद जेल वापस नहीं लौटा था। हाईकोर्ट ने पाया कि राहुल के खिलाफ बताए गए छह मामलों में से पांच में वह बरी हो चुका है। जेल में उसका आचरण भी अच्छा रहा है और अधिकारियों ने उसकी रिहाई से राज्य की सुरक्षा को खतरा नहीं बताया।
अदालत ने कहा कि सह-अभियुक्त के फरार होने को राहुल के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हर कैदी के मामले का आकलन उसके अपने आचरण और उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री के आधार पर होना चाहिए। केवल अनुमान या आशंका के आधार पर पैरोल रोकना उचित नहीं है।