हरियाणा के सरकारी विभागों से जुड़े आईडीएफसी फर्स्ट बैंक घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने बुधवार को हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एचएसपीसीबी) में तैनात डाटा एंट्री ऑपरेटर सौरभ शर्मा को गिरफ्तार किया है। सीबीआई ने उसे इस घोटाले की अहम कड़ी बताया है। उस पर निजी बैंकों को कथित तौर पर अनुचित लाभ पहुंचाने, सरकारी धन निवेश नियमों की अनदेखी करने और डिजिटल साक्ष्य मिटाने में भूमिका निभाने का आरोप है। पंचकूला की जिला अदालत ने उसे चार दिन के सीबीआई रिमांड पर भेजा है।
सीबीआई के अनुसार सौरभ शर्मा ने अन्य सह-आरोपियों, निजी बैंक अधिकारियों और कुछ लोक सेवकों के साथ मिलकर सरकारी फंड के निवेश को लेकर एक सुनियोजित आपराधिक साजिश रची। जांच एजेंसी के अनुसार आरोपी को सरकारी धन निवेश से जुड़े वित्त विभाग के नियमों और सीमाओं की पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद उसने नियमों को जानबूझकर नजरअंदाज किया और निजी बैंक के पक्ष में निवेश प्रस्तावों को पास करने में सहायता की।
सीबीआई के अनुसार, 12 जुलाई 2024 को जारी वित्त विभाग के सर्कुलर में सार्वजनिक धन के निवेश की सीमा (50 करोड़ रुपये) स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई थी। इसके बावजूद आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में निवेश लगातार बढ़ाया गया। आईडीएफसी के खाते में 18 मार्च 2025 में यह राशि बढ़कर 67.90 करोड़ रुपये पहुंच गई। 24 जून 2025 में यह रकम 105.68 करोड़ व एक अक्तूबर 2025 में 113.68 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
इसी खाते से 13 मार्च 2025 से 13 फरवरी 2026 के बीच करीब 187 करोड़ (1,87,26,25,598) रुपये के संदिग्ध लेन-देन हुए। शुरुआती जांच में सामने आया है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा शेल कंपनियों के खातों में भेजा गया। इन कंपनियों का नियंत्रण कथित तौर पर मुख्य आरोपियों के पास था। सीबीआई का आरोप है कि सरकारी धन को योजनाबद्ध तरीके से निजी नेटवर्क के माध्यम से बाहर निकाला गया। यह सीधा-सीधा वित्तीय नियमों का उल्लंघन है और इससे करीब 169 करोड़ (1,69,35,97,018) रुपये का गबन हुआ।
घोटाले की अहम कड़ी निकला सौरभ
सीबीआई के अनुसार सौरभ की भूमिका महज एक क्लर्क या डाटा एंट्री ऑपरेटर तक सीमित नहीं थी। वह निजी बैंकों के प्रतिनिधियों के साथ लगातार संपर्क में था। सौरभ पर आरोप है कि उसने सरकार के निवेश प्रस्ताव, सरकारी फंड की मैच्योरिटी, विभिन्न बैंकों द्वारा ऑफर की जा रही ब्याज दरें और विभागीय फाइलों की आवाजाही जैसी अत्यंत गोपनीय जानकारियां निजी बैंक अधिकारियों तक पहुंचाई। इससे बैंक अधिकारियों की सरकारी अधिकारियों तक सीधी पहुंच बन गई।
आरोपी ने यह सब किसी सरकारी जिम्मेदारी के तहत नहीं किया, बल्कि इसके बदले उसे निजी व्यक्तियों और बैंक प्रतिनिधियों से आर्थिक लाभ मिला। सीबीआई को आशंका है कि पूरे मामले में रिश्वत और कमीशन का नेटवर्क सक्रिय रहा हो सकता है।
रिमांड पर आरोपी
सीबीआई ने अदालत से रिमांड मांगते हुए तर्क दिया कि जांच के दौरान जब्त किए गए मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में कई महत्वपूर्ण चैट, कॉल लॉग और डिजिटल रिकॉर्ड डिलीट मिले हैं। अदालत में एजेंसी ने कहा कि पूछताछ के दौरान आरोपी सहयोग नहीं कर रहा और कई सवालों के गोलमोल जवाब दे रहा है। सीबीआई प्रवक्ता के अनुसार रिमांड के दौरान गबन की रकम से खरीदी गई संपत्तियों का पता लगाया जाएगा और सोना, नकदी व अन्य निवेश की बरामदगी की जाएगी। अवैध लेन-देन के पूरे नेटवर्क को खंगालने, निजी बैंक अधिकारियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों की भूमिका की जांच व कथित रिश्वतखोरी और आर्थिक लाभ की कड़ियां जोड़ने के लिए पूछताछ जरूरी है।