हरियाणा निकाय चुनाव के नतीजे सैनी सरकार के कामकाज व भाजपा की नीतियों पर शहरी मतदाता की मुहर हैं। कांग्रेस के लिए ये नतीजे आत्ममंथन से अधिक आत्मरक्षा का विषय हैं।
मतदान के लिए तीन दिन शेष थे। रोहतक जिले की सांपला नगर पालिका के वार्डों में भाजपा ने एक ही दिन में तीन कैबिनेट मंत्रियों को प्रचार में पूरी तरह झोंक रखा था। उससे अगले दिन खुद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी वहां आते हैं और कांग्रेस, खासकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के गढ़ में भाजपा का माहौल बना जाते हैं। हमें बताया गया कि हुड्डा साहब वहां इसलिए प्रचार के लिए नहीं गए कि यह भाईचारे का चुनाव है, कांग्रेस ने यहां उम्मीदवार ही नहीं उतारा।
विज्ञापन
दरअसल, हरियाणा के सात नगर निकायों के चुनाव परिणामों ने प्रदेश की राजनीति के उस सच को एक बार फिर रेखांकित कर दिया है जिसे विपक्षी दल कांग्रेस स्वीकारने से कतरा रहा है। सात नगर निकायों में से छह पर भाजपा का कब्जा होना केवल एक स्थानीय जीत नहीं है बल्कि यह भाजपा के उस विजय रथ की निरंतरता है जिसने पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस की सांगठनिक शक्ति को हाशिये पर धकेल दिया है।
पंचकूला, अंबाला और सोनीपत नगर निगमों के अलावा रेवाड़ी नगर परिषद और सांपला व धारूहेड़ा नगर पालिका में मिली जीत भाजपा के लिए उत्साहवर्धक है जबकि कांग्रेस के लिए यह परिणाम गंभीर चेतावनी हैं।भाजपा की इस सफलता को यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक स्पष्ट पैटर्न नजर आता है।
पहले लगातार तीन बार विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करना, फिर 2025 में 11 में से 10 निकायों पर कब्जा, राज्यसभा की सीट झटकना और अब सात में से छह निकायों में परचम लहराना...यह सिद्ध करता है कि भाजपा ने हरियाणा में एक ‘अजेय इलेक्शन मशीन’ तैयार कर ली है।
यह जीत भाजपा और मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व वाली सरकार की नीतियों पर जनता की सीधी मुहर है। निकाय चुनावों में स्थानीय मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन सत्ता पक्ष के प्रति जनता का भरोसा या नाराजगी भी इन चुनावों में साफ झलकती है। यदि मतदाताओं में सरकार के प्रति व्यापक असंतोष होता तो उसका असर कहीं न कहीं जरूर दिखाई देता।
कांग्रेस के लिए ये नतीजे आत्ममंथन से अधिक आत्मरक्षा का विषय
इसके उलट भाजपा को मिला समर्थन यह संकेत देता है कि सरकार के कामकाज को लेकर जनता में फिलहाल स्वीकार्यता बनी हुई है। मतदाताओं ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है वे धरातल पर दिखने वाली सक्रियता और ‘प्रो-इंकंबेंसी’ पर भरोसा कर रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए ये नतीजे आत्ममंथन से अधिक आत्मरक्षा का विषय बन गए हैं।
विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद उम्मीद थी कि कांग्रेस एक नई ऊर्जा और एकजुटता के साथ मैदान में उतरेगी लेकिन हकीकत इसके उलट रही। कांग्रेस गुटबाजी के उसी पुराने दलदल में फंसी नजर आई। चुनाव में पूरी ताकत झोंकने के बजाय पार्टी का अभियान बिखरा हुआ और औपचारिक लगा।
अब खिसक रहा है कांग्रेस का पारंपरिक आधार
बेशक कांग्रेस ने यह चुनाव प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र के नेतृत्व में लड़ा लेकिन इन परिणामों ने कांग्रेस के समूचे शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर पूर्व मुख्यमंत्री और विधायक दल के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा की रणनीति पर गहरा सवालिया निशान लगा दिया है। सोनीपत, अंबाला जैसे क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ मजबूत होना यह बताता है कि कांग्रेस का पारंपरिक आधार भी अब खिसक रहा है।
भाजपा की सफलता का राज उसकी ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ शैली में है। पार्टी किसी भी चुनाव को छोटा नहीं मानती। जहां पेच ढीला हो, उसे तुरंत कसना और बूथ स्तर तक कार्यकर्ता को सक्रिय रखना भाजपा की संस्कृति बन चुकी है। इसके उलट कांग्रेस का ढांचा तो खड़ा हुआ लेकिन चुनाव में उतना सक्रिय नहीं हुआ और हुआ भी तो आपसी गुटों में बंटकर। उकलाना में एक निर्दलीय की जीत (जिसे कांग्रेस समर्थित बताया जा रहा है) पार्टी के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से ज्यादा ‘फेस-सेविंग’ (साख बचाने) की कवायद मात्र है।
ये नतीजे बताते हैं कि हरियाणा का मतदाता फिलहाल किसी प्रयोग के मूड में नहीं है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अपनी सौम्य छवि और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता से जनता के बीच जो पैठ बनाई है उसे भेदने में विपक्ष पूरी तरह विफल रहा है। लगातार चुनावी झटकों के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और दिशा को लेकर नई बहस तेज होना स्वाभाविक है।