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सात साल में छह बदले: कांग्रेस में बदलते रहे प्रभारी, नहीं बदली गुटबाजी की तस्वीर; इस बार बदलेगा संगठन का हाल?

Sun, 12 Jul 2026 12:41 PM IST
Sharukh Khan आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

हरियाणा कांग्रेस में सात साल में छह प्रभारी बदल गए। लेकिन गुटबाजी की तस्वीर नहीं बदली। नए प्रभारी संजय दत्त के मंथन के बीच फिर वही सवाल, क्या इस बार संगठन का हाल बदलेगा। संगठनात्मक कमजोरी भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती रही है।
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Haryana Congress - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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हरियाणा कांग्रेस में पिछले सात वर्षों के दौरान छह प्रभारी बदले जा चुके हैं लेकिन संगठन की सबसे बड़ी चुनौती मानी जाने वाली गुटबाजी अब भी जस की तस बनी हुई है। हर नए प्रभारी के आगमन के साथ नेताओं से मुलाकात, संगठनात्मक मंथन और एकजुटता के दावे किए जाते रहे हैं लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव नहीं दिखा। 
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यही कारण है कि पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है और संगठनात्मक एकजुटता का सवाल लगातार बना हुआ है। नवनियुक्त प्रभारी संजय दत्त पिछले चार दिनों से प्रदेश के नेताओं, विधायकों, सांसदों, जिला अध्यक्षों और कार्यकर्ताओं से अलग-अलग बैठकें कर संगठन की स्थिति का आकलन कर रहे हैं। 

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उन्होंने विभिन्न गुटों के नेताओं से वन-टू-वन चर्चा कर फीडबैक लिया है। अब राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि यह कवायद भी पूर्व की तरह केवल मंथन तक सीमित रहेगी या संगठनात्मक स्तर पर इसका कोई ठोस परिणाम भी सामने आएगा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरियाणा कांग्रेस में प्रभारी की भूमिका कई बार इसलिए प्रभावी नहीं रह सकी क्योंकि प्रदेश के बड़े नेताओं की तुलना में उनका राजनीतिक कद अपेक्षाकृत छोटा रहा। 

 

ऐसे में वे भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कुमारी सैलजा और रणदीप सिंह सुरजेवाला जैसे प्रभावशाली नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करने में सफल नहीं हो सके। प्रदेश में लंबे समय से यह धारणा रही है कि संगठन को एकजुट रखने के लिए राष्ट्रीय स्तर के प्रभावशाली नेतृत्व की आवश्यकता है।

 

संगठनात्मक कमजोरी भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती रही है। लंबे समय तक जिला और बूथ स्तर का ढांचा पूरी तरह सक्रिय नहीं हो सका। प्रभारी और प्रदेश नेतृत्व की बातचीत प्राय: वरिष्ठ नेताओं तक सीमित रही, जबकि संगठन को मजबूत करने के लिए जिला और बूथ स्तर तक निर्णयों का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक माना जाता है। 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्ता से बाहर रहने के कारण भी संगठन पर प्रभाव पड़ा है। सरकार में न होने से राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव सीमित रहता है जिससे बड़े नेताओं के बीच समन्वय और कार्यकर्ताओं को सक्रिय बनाए रखना अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे में कांग्रेस के सामने ऐसा संगठनात्मक ढांचा तैयार करना बड़ी चुनौती है जो शीर्ष नेतृत्व से लेकर बूथ स्तर तक प्रभावी तालमेल स्थापित कर सके।
 

संजय दत्त ने संगठन मजबूत करने पर दिया जोर
प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में शनिवार को आयोजित बैठक में प्रभारी संजय दत्त ने पार्टी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों के साथ संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा की। उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने पर जोर दिया। 

उन्होंने कहा कि कांग्रेस को बेरोजगारी, महंगाई, किसानों, कर्मचारियों, युवाओं और महिलाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर गांव-गांव और शहर-शहर जनता के बीच जाना होगा। बाद में कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी प्रभारी से मुलाकात कर अपनी समस्याएं रखीं।

गोकुल सेतिया ने उठाए संगठन पर सवाल
सिरसा विधायक गोकुल सेतिया ने सिरसा में पत्रकारों से बातचीत में बिना नाम लिए भाजपा से कांग्रेस में आए नेताओं पर निशाना साधा। कहा, जो लोग पहले भाजपा में रहे, वे अब पुराने कांग्रेसियों को नसीहत दे रहे हैं। किसान आंदोलन के दौरान किसानों का विरोध करने वाले नेताओं को आज पार्टी में आगे जगह मिल रही है, जबकि संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को सम्मान मिलना चाहिए। 

 

सेतिया ने प्रभारी के साथ हुई बैठक में सीट व्यवस्था पर भी नाराजगी जताई। कहा, उनकी और विधायक देवेंद्र हंस की सीट पीछे लगाई गई थी, इसलिए वे आगे जाकर बैठे। उन्होंने इसे निर्वाचित विधायकों के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताया। उन्होंने 2014 में कांग्रेस छोड़ने का कारण भी तत्कालीन प्रदेश नेतृत्व को बताया। 

 

सेतिया ने हाईकमान को सलाह देते हुए कहा कि पहले अपने विधायकों को संभालना जरूरी है। 37 विधायकों से घटकर पार्टी अब 32 पर आ गई है, ऐसे में निर्वाचित प्रतिनिधियों का मनोबल बढ़ाना होगा। सेतिया ने कहा कि पार्टी मंच पर संघर्ष करने वालों को आगे लाना होगा तभी हरियाणा में कांग्रेस संगठन मजबूत हो सकेगा।

 
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प्रभारी प्रयास कर रहे हैं, मगर ऐसा नहीं लगता है कि कुछ हो पाएगा। कांग्रेस के अंदर गुटबाजी काफी हावी हो चुकी है। बीते चुनाव में जनता ने कांग्रेस का भरपूर साथ दिया था मगर गुटबाजी की वजह से ही कांग्रेस जीत के करीब पहुंचकर हार गई। कांग्रेस के अंदर यह बीमारी तभी खत्म हो पाएगी, जब हाईकमान कोई मजबूत फैसला लेना होगा। कांग्रेस के अंदर लोग सिर्फ कुर्सी के लिए बल्कि बैठने के लिए भी लड़ रहे हैं। सिरसा के विधायक का बयान आपने सुना ही होगा।- डॉ. आरआर मलिक राजनीतिक विश्लेषण हरियाणा
 
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