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नायब सैनी का बदला अंदाज: विवादों को सड़क पर नहीं खिंचने दे रहे, हिसार से करनाल तक खुद संभाला मोर्चा

Thu, 20 Aug 2026 10:46 AM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

हरियाणा के सीएम नायब सैनी का सीधे लोगों और प्रभावित पक्षों से संवाद करना यह संदेश देता है कि अंतिम फैसला मुख्यमंत्री के स्तर पर हो सकता है और सरकार विवादों को सड़क पर लंबा खिंचने देने के बजाय बातचीत से खत्म करना चाहती है।
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नायब सैनी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी अब सिर्फ सरकार चलाने की भूमिका में नहीं, बल्कि अपनी ही सरकार के संकटमोचक के तौर पर भी उभरते दिखाई दे रहे हैं। हाल के कुछ मामलों में पुलिस-प्रशासन और स्थानीय स्तर के नेताओं के प्रयास जब जनता के आक्रोश और संगठनों के विरोध को शांत नहीं कर पाए, तब मुख्यमंत्री के सीधे हस्तक्षेप से गतिरोध टूटा। राजनीतिक तौर पर यह सैनी के लिए महत्वपूर्ण बदलाव है।
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हिसार के डेयरी संचालक जीवन कुंडू हत्याकांड को लेकर संघर्ष समिति और पुलिस-प्रशासन के बीच करीब दो सप्ताह से गतिरोध चल रहा था। मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के बाद विवाद खत्म हुआ। 

इसी तरह पंजोखरा साहिब गुरुद्वारे में पंजाब के खालिस्तान विरोधी नेता गुरसिमरन सिंह मंड के साथ मारपीट के मामले में गिरफ्तार लोगों की रिहाई को लेकर पुलिस और सिख संगत के बीच बना तनाव भी सैनी के हस्तक्षेप के बाद समाप्त हुआ। यह तनाव इतना बढ़ गया था कि सिख संगत के रोष से प्रशासन के हाथ-पांव खोल फूल गए थे, मगर सैनी सबको मनाने में कामयाब रहे। 
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करनाल में बीरू बाल्मीकि हत्याकांड के बाद हर्ष और बीरबल के एनकाउंटर को लेकर रोड समाज में नाराजगी थी। यह मामला भी मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद शांत हुआ। इन घटनाओं में एक समान बात यह रही कि स्थानीय स्तर पर बढ़ता विवाद सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन रहा था और मुख्यमंत्री ने सीधे बातचीत कर उसे खत्म करने की कोशिश की।
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चनाैत प्रकरण के बाद आया बदलाव

जानकारों का मानना है कि चनौत प्रकरण के बाद मुख्यमंत्री के संकट से निपटने के तौर-तरीके में बदलाव आया है। इस मामले को सुलझाने के मुख्यमंत्री के प्रयास सफल नहीं हो पाए और पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल के हस्तक्षेप के बाद गतिरोध खत्म हुआ। इससे राजनीतिक तौर पर यह संदेश गया कि सरकार में संकट के समाधान के लिए एक से अधिक प्रभावी केंद्र मौजूद हैं। 

यह स्थिति किसी भी सरकार के लिए असहज मानी जाती है, क्योंकि इससे मुख्यमंत्री के नेतृत्व और निर्णय क्षमता को लेकर सवाल उठने की गुंजाइश बनती है। हाल के मामलों में सैनी का सीधे हस्तक्षेप इसी धारणा को बदलने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

अगर स्थानीय नेता और प्रशासन अपने स्तर पर विवाद नहीं सुलझा पाते और मामला बार-बार मुख्यमंत्री तक पहुंचता है, तो इससे सरकार की छवि पर असर पड़ता है। लेकिन जब मुख्यमंत्री खुद आगे आकर मामले को सुलझाते हैं, तो इसका सीधा फायदा उनके नेतृत्व और सरकार की छवि को मिलता है।
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