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दिव्यांगता के आधार पर सेवानिवृत्ति आयु में विस्तार मौलिक अधिकार नहीं : हाई कोर्ट

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चतुर्थ श्रेणी दिव्यांग कर्मचारी की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने की मांग हाईकोर्ट ने की खारिज
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दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम को लेकर हाईकोर्ट का अहम फैसला

चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि दिव्यांगता के आधार पर सरकारी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति आयु में विस्तार का कोई वैधानिक या मौलिक अधिकार नहीं है। दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 1995 को लेकर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो दिव्यांग कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने का स्वत अधिकार देता हो।
जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने हरियाणा सरकार के ग्रुप-डी कर्मचारी सुशील कुमार की याचिका खारिज कर दी है। याची की दलील थी कि वह दिव्यांग है और चूंकि ग्रुप-ए से ग्रुप-सी के दिव्यांग कर्मचारियों को दो वर्ष का सेवा विस्तार दिया गया है इसलिए उसे भी 62 वर्ष की आयु तक सेवा में बने रहने का अधिकार मिलना चाहिए। अदालत ने पाया कि ग्रुप-डी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु नियमों के अनुसार 60 वर्ष निर्धारित है और याचिकाकर्ता को इसी आधार पर सेवानिवृत्त किया गया। कोर्ट ने कहा कि पहले जिन मामलों में ग्रुप-ए से ग्रुप-सी के दिव्यांग कर्मचारियों को विस्तार मिला वह किसी स्पष्ट और सचेत सरकारी नीति का परिणाम नहीं था।
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अदालत ने यह रेखांकित किया कि 1988 और 1996 के निर्देश केवल दृष्टिबाधित कर्मचारियों के लिए न्यूनतम सेवा अवधि सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जारी किए गए थे, न कि सभी दिव्यांग कर्मचारियों को सामान्य रूप से सेवा विस्तार देने के लिए। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि हिमाचल प्रदेश में इसी प्रकार के लाभ पहले ही वापस ले लिए गए हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे निर्णय को वैध ठहराया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि दिव्यांगता के आधार पर सेवानिवृत्ति आयु में विस्तार कोई मौलिक या वैधानिक अधिकार नहीं है और यह पूरी तरह राज्य सरकार की नीति पर निर्भर करता है।
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