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मुआवजे के लिए आश्रित होना अनिवार्य नहीं: हाईकोर्ट ने पलटा मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल जींद का फैसला

Tue, 14 Jul 2026 09:16 AM IST
Nivedita विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

सर्वोच्च अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि मोटर वाहन कानून के तहत मृतक के कानूनी वारिस मुआवजे की याचिका दायर कर सकते हैं। इसके लिए आर्थिक रूप से आश्रित होना जरूरी नहीं है।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सड़क दुर्घटना में माता-पिता की मौत होने पर शादीशुदा और कमाने वाले बेटा-बेटी भी मुआवजे के हकदार हैं। मुआवजे के लिए आश्रित होना अनिवार्य नहीं है। 
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जस्टिस विकास बहल ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) जींद के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें आश्रित न होने के आधार पर मुआवजा देने से इन्कार किया गया था।

हाई कोर्ट ने बीमा कंपनी को 11,62,266 रुपये का मुआवजा 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित दो माह के भीतर अदा करने का निर्देश दिया है। यह मामला 30 अप्रैल 2015 को हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है। इसमें 70 वर्षीय बलवान की मौत हो गई थी। उनके शादीशुदा बेटे और बेटी ने मुआवजे की मांग की थी।
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ट्रिब्यूनल का फैसला रद्द
जींद ट्रिब्यूनल ने दुर्घटना को लापरवाही से वाहन चलाने के कारण हुई माना था। हालांकि, उसने यह कहते हुए मुआवजा देने से इन्कार कर दिया था कि दावेदार शादीशुदा हैं और मृतक पर निर्भर नहीं थे। इसके खिलाफ राम प्रसाद और उनकी बहन ने हाई कोर्ट में अपील दाखिल की। जस्टिस विकास बहल ने ट्रिब्यूनल के इस दृष्टिकोण को कानून के विपरीत बताया।

सर्वोच्च अदालत का हवाला
हाई कोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि मोटर वाहन कानून के तहत मृतक के कानूनी वारिस मुआवजे की याचिका दायर कर सकते हैं। इसके लिए आर्थिक रूप से आश्रित होना जरूरी नहीं है। शादीशुदा और कमाने वाले बेटे-बेटी भी कानूनी वारिस होने के कारण मुआवजे के पात्र हैं। मृतक बलवान नियमित आयकरदाता थे और दुर्घटना से पहले उनकी वार्षिक आय 3,15,680 रुपये थी। हाई कोर्ट ने इसी आय को आधार बनाकर मुआवजे की गणना की।
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