अदालत ने दुष्कर्म, हत्या, अपहरण और साक्ष्य मिटाने के अपराध में उसकी दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा। साथ ही पुलिस जांच में दस्तावेज गढ़ने, लोक अभियोजक की गंभीर लापरवाही और ट्रायल कोर्ट की विफलताओं पर कड़ी टिप्पणी की।
सात साल की उम्र पूरी होने से महज 17 दिन पहले दुष्कर्म और हत्या की शिकार हुई मासूम बच्ची के दोषी की सजा-ए-मौत को हाईकोर्ट ने बिना किसी छूट के 50 वर्ष की वास्तविक कैद में बदल दिया है।
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24 मई 2021 को पलवल में सात साल से कम उम्र की बच्ची को आनंद सिंह उसके माता-पिता के काम पर जाने के बाद बहला-फुसलाकर ले गया। खेतों में ले जाकर उसके साथ दोनों ओर से दुष्कर्म किया, गला दबाकर हत्या कर दी और शव को गड्ढे में छिपा दिया। पलवल की ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में आनंद सिंह को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।
अदालत ने दुष्कर्म, हत्या, अपहरण और साक्ष्य मिटाने के अपराध में उसकी दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा। साथ ही पुलिस जांच में दस्तावेज गढ़ने, लोक अभियोजक की गंभीर लापरवाही और ट्रायल कोर्ट की विफलताओं पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने ट्रायल कोर्ट की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हर मुकदमा एक जहाज की तरह है जिसे किनारे तक पहुंचना है और जब वह मुश्किल पानी में हो तो ट्रायल जज जहाज छोड़ने वाला अंतिम व्यक्ति होना चाहिए।
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खंडपीठ ने पीड़िता के कपड़ों की पहचान न कराए जाने को लोक अभियोजक और ट्रायल कोर्ट की बड़ी चूक बताया। अदालत ने कहा कि यह जांच एजेंसी की नहीं बल्कि अभियोजन और दोनों ट्रायल जजों की विफलता थी।
अदालत ने कहा कि न्यायाधीश का मूल कर्तव्य न्याय सुनिश्चित करना है ताकि कोई निर्दोष दंडित न हो और कोई दोषी बच न सके। अदालत ने दोषसिद्धि बरकरार रखी और फांसी की सजा को बिना छूट 50 वर्ष के वास्तविक आजीवन कारावास में बदल दिया। साथ ही हत्या के मामले में 50 लाख और पॉक्सो मामले में 23 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया, जिसकी वसूली होने पर राशि पीड़िता के परिवार को मुआवजे के रूप में दी जाएगी।