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माता या पिता के पास बच्चे की कस्टडी नहीं मानी जा सकती गैर कानूनी : हाईकोर्ट

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- प्राकृतिक अभिभावक के पास बच्चा हो तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका वैध नहीं
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- नाै साल की बच्ची को पाने के लिए मां की दाखिल की गई याचिका खारिज अमर उजाला ब्यूरो



चंडीगढ़। बाल अभिरक्षा (कस्टडी) से जुड़े एक अहम मामले में पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि नाबालिग बच्चा प्राकृतिक अभिभावक (नेचुरल गार्जियन) के पास है तो उसकी कस्टडी को गैर कानूनी नहीं माना जा सकता। साथ ही यदि उसकी सुरक्षा को लेकर कोई तात्कालिक खतरा नहीं दिखता तो ऐसे मामलों में हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। कोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ ही मां की याचिका को खारिज कर दिया।


जस्टिस सुमित गोयल के समक्ष गुरुग्राम निवासी मां की ओर से दायर याचिका सुनवाई के लिए पहुंची थी। याचिका में उसने नौ वर्षीय बेटी को आलम में पेश करने और उसकी अंतरिम कस्टडी की मांग की थी। मामले में पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद के चलते अगस्त 2024 से अलगाव चल रहा था। बच्ची अपने पिता और दादा-दादी के साथ रह रही थी। याचिकाकर्ता मां ने आरोप लगाया कि पिता और उसके परिजनों ने बच्ची को अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है और उसकी भलाई पर असर पड़ रहा है।
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मां ने दलील दी कि वह प्राकृतिक मां होने के नाते बच्ची की कस्टडी की हकदार है और पिता की अनुपस्थिति में बच्ची को किसी तीसरे व्यक्ति के पास रखना गैरकानूनी है।



हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तभी सुनवाई योग्य होती है जब हिरासत अवैध या कानून के अधिकार के बिना हो। यदि बच्चा अपने प्राकृतिक अभिभावक के पास है तो सामान्य परिस्थितियों में उसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में हैबियस कॉर्पस का उपयोग सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। यह विस्तृत जांच का विकल्प नहीं है खासकर जब तथ्य विवादित हों। अदालत ने पाया कि बच्ची अपने पिता के पास रह रही है जो कि प्राकृतिक अभिभावक है। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि बच्ची की हिरासत अवैध है या उसे कोई तात्कालिक खतरा है।
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कोर्ट ने कहा कि केवल आशंका के आधार पर वारंट अधिकारी नियुक्त करने जैसे आदेश नहीं दिए जा सकते। अदालत ने दोहराया कि बच्चे के हित सर्वोपरि हैं लेकिन ऐसे मामलों में विस्तृत तथ्यों की जांच आवश्यक होती है, जो रिट याचिका के दायरे में संभव नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को गैर प्रभावी (नॉट मेंटेनबल) मानते हुए खारिज कर दिया। साथ ही याचिकाकर्ता को संबंधित पारिवारिक अदालत या सक्षम मंच पर उचित कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी।
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