चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि यदि सरकार या विभाग समय पर अनिवार्य विभागीय परीक्षा आयोजित नहीं करते या कर्मचारियों को उसकी सूचना नहीं देते, तो इसका खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना पड़ेगा।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा कि प्रशासनिक या तकनीकी लापरवाही के कारण किसी कर्मचारी को आर्थिक और सेवा संबंधी लाभों से वंचित करना न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है। रेवाड़ी निवासी चंद्र प्रकाश ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए तीसरी वित्तीय उन्नति से वंचित करने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने बताया कि वह अगस्त 1973 में सहायक लाइनमैन नियुक्त हुआ और जुलाई 1976 में नियमित हुआ था। अक्तूबर 1993 में वह लाइनमैन बना और 30 जून 2008 को सेवानिवृत्त हो गया। 2013 में उसकी तीसरी वित्तीय उन्नति का दावा यह कहकर खारिज कर दिया गया कि उसने सेफ्टी कोड टेस्ट पास नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि न तो उसे इस परीक्षा की तिथि की जानकारी दी गई और न ही व्यक्तिगत रूप से सूचित किया गया।
इसके अलावा यह प्रावधान 27 फरवरी 2009 के परिपत्र के जरिए लागू हुआ था, जबकि याचिकाकर्ता इससे पहले ही 2008 में रिटायर हो चुका था। ऐसे में नियम को उनके खिलाफ लागू करना पूरी तरह गलत है। ब्यूरो