डूबने से होने वाली संदिग्ध मौतों में भी विसरा जांच के लिए भेजा जाता है। अनेक मामले ऐसे है, जिनमें परिजनों को ये ही नहीं पता कि विसरा रिपोर्ट आई या नहीं। ऐसे में उनके बच्चों या परिजनों की मौत आज भी राज ही बनी है। ऐसे परिजनों का सिर्फ यहीं कहना है कि पुलिस ने उनके मामलों में कोई कार्रवाई नहीं की।
हर साल ही डूबने से पांच-छह मौत सामने आ रही है। यह सिलसिला पिछले काफी वर्षों से चल रहा है। संदिग्ध मौतों में परिजन हत्या की आशंका भी जताते है। मगर उस समय हालत संदिग्ध परिजनों को आश्वासन दिया जाता है कि विसरा रिपोर्ट आने के बाद जांच की जाएगी और सारा खुलासा होगा। मगर अनेक केस ऐसे सामने आए है, जिनमें मरने वाले के परिजन पहले विसरा रिपोर्ट का इंतजार ही करते रहे और अब उन्हें पता ही नहीं कि विसरा रिपोर्ट आई या नहीं। न पुलिस ने उन्हें विसरा रिपोर्ट के बारे में कुछ बताया और न ही उनके केस में कोई कार्रवाई हुई।
25 अप्रैल 2014 में चिड़ियाघर के पीछे जलघर के टैंकों में डूबने से हुई दो दोस्तों की मौत आज भी राज बनी है। उस समय इत्तफाकिया मौत की कार्रवाई की गई थी। उस समय विसरा रिपोर्ट के आधार पर आगामी कार्रवाई की बात कही गई थी। इस हादसे में मारे गए करीब साढ़े 17 वर्षीय जतिन के पिता खुशहाल सिंह ने बताया कि उन्हें रिपोर्ट की कोई जानकारी नहीं। उन्हें उस समय आशंका थी और पुलिस के समक्ष अपनी बात रखी थी। आज तक मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसा ही वर्ष 2016-17 में स्वीमिंग पुल में हुई हाउसिंग बोर्ड में किराये पर रहने वाले एक युवक की मौत मामले में हुआ। युवक के अभिभावक जांच के लिए काफी समय तक नेताओं, अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे। मामले में अभी तक जांच लंबित है।
जांच अधिकारी बदलने से भी बनती है समस्या : सभी थानों में जांच अधिकारी होते है। मगर लगभग प्रति वर्ष जांच अधिकारियों की एक थाने से दूसरे थाने या रेंज के दूसरे जिलों में ट्रांसफर हो जाती है। जांच अधिकारियों के ट्रांसफर से भी समस्या बनती है। जिसके बाद संबंधित केस की फाइल अन्य फाइलों में दब जाती है।