भिवानी। चौधरी बंसीलाल नागरिक अस्पताल और नवनिर्मित मेडिकल कॉलेज में ओपीडी सेवाओं की अलग-अलग व्यवस्था मरीजों के लिए परेशानी बन गई है। दोनों परिसरों के बीच तालमेल की कमी से मरीजों को पर्ची बनवाने से लेकर जांच और इलाज तक के लिए भटकना पड़ रहा है।
स्थानीय निवासियों और मरीजों के परिजनों में इस अव्यवस्था को लेकर स्वास्थ्य प्रशासन के खिलाफ रोष है। स्थानीय निवासी सुरेश, उमेश, राकेश और सुरेंद्र का कहना है कि दोनों परिसरों की सेवाओं का पूर्ण एकीकरण किया जाए या कम से कम पर्ची प्रणाली साझा हो। उन्होंने मांग की कि दोनों जगह एक ही पर्ची मान्य की जाए या स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी हों ताकि मरीजों को बेवजह चक्कर न काटने पड़ें।
इस बारे में अस्पताल प्रभारी डॉ. बलवान सिंह ने बताया कि नागरिक अस्पताल में मरीजों की नियमित जांच की जा रही है। मेडिकल कॉलेज में भी मरीजों की जांच होती है और दोनों जगह चिकित्सक मौजूद रहते हैं।
पर्ची की मान्यता को लेकर असमंजस
नागरिक अस्पताल में बनवाई गई ओपीडी पर्ची मेडिकल कॉलेज में मान्य नहीं की जा रही है। वहीं मेडिकल कॉलेज की पर्ची लेकर नागरिक अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को भी वापस लौटाया जा रहा है। लंबी कतारों में लगकर पर्ची बनवाने के बाद डॉक्टर को दिखाने पहुंचने पर मरीजों को दूसरे परिसर में भेज दिया जाता है। उन्हें दोबारा लाइन में लगकर नई पर्ची बनवानी पड़ती है जिससे समय और ऊर्जा दोनों बर्बाद होते हैं।
डॉक्टरों के जांच और इलाज से इन्कार
इस व्यवस्था से गंभीर रूप से बीमार मरीजों और बुजुर्गों को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है। मरीजों को एक परिसर से दूसरे में रेफर या भेजे जाने पर वहां के चिकित्सक दूसरे परिसर की पर्ची पर जांच करने से इन्कार कर देते हैं। डॉक्टरों का तर्क होता है कि संबंधित विभाग या विशेषज्ञ चिकित्सक दूसरी जगह बैठते हैं इसलिए मरीज वहीं जाकर नई पर्ची बनवाएं। इस टालमटोल के कारण मरीजों को काउंटरों और अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
लंबी कतारों में हो रही समय की बर्बादी
नागरिक अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में सुबह से ही मरीजों की भीड़ जुटने लगती है। पंजीकरण काउंटर पर घंटों इंतजार के बाद दूसरे परिसर में इलाज होने की जानकारी मिलने पर मरीजों की मशक्कत बेकार हो जाती है। कई बार पर्ची बनवाने और भटकने में दोपहर तक समय निकल जाता है और डॉक्टरों के उठने का वक्त हो जाता है। ऐसे में दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आए गरीब मरीज बिना इलाज घर लौटने या निजी अस्पतालों का रुख करने को मजबूर होते हैं, जिससे उन पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।