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विधायक और उपायुक्त ने किया जीर्णोद्धार कार्य का निरीक्षण

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लठिया वाला जोहड़ का जीर्णोद्धार कार्य का निरीक्षण करते उपायुक्त जयबीर सिंह आर्य व विधायक घनश्य? - फोटो : Bhiwani
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भिवानी। शहर के सेक्टर 23 के समील प्राचीन तीर्थ स्थल लठिया वाला जोहड़ का करीब 100 साल बाद जीर्णोद्धार का कार्य किया जा रहा है। विधायक घनश्याम दास सर्राफ और उपायुक्त जयबीर सिंह आर्य ने शनिवार को जीर्णोद्धार के कार्य का निरीक्षण किया। उपायुक्त ने कहा कि प्रशासन के सहयोग से इस प्राचीन तालाब को फिर से आबाद किया जाएगा।
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बता दें कि विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के सहयोग प्राचीन लठिया वाला जोहड़ का जीर्णोद्धार किया जा रहा है। मिट्टी से अटे पड़े तालाब की जेसीबी से खुदाई की जा रही है। चारों ओर से इसे समतल किया जा रहा है। फरवरी मेें यहां पर करीब पांच हजार पौधे लगाए जाएंगे। तालाब के चारों ओर भी पौधे लगाए जाएंगे।
तालाब के चारों कोनों पर बनाए जाएंगे गुंबद
विधायक सर्राफ ने बताया कि तालाब के चारों ओर घूमने के लिए आठ फुट चौड़ी पगडंडी बनाई जाएगी। चारों कोनों पर बड़े गुंबद बनाए जाएंगे। चारों गुंबदों पर घोंसले बनाए जाएंगे, जहां पर हजारों पक्षियों को आसरा मिलेगा। साथ ही तालाब के चारों ओर 25 बड़ी लाइटें भी लगाई जाएंगी। तालाब के बीचोंबीच ऐसा चबूतरा बनाया जाएगा, जिसके बीच एक फव्वारा भी लगेगा। यहां एक अन्य घाट और भी बनाया जाएगा।
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महिलाओं के लिए बनाए हैं दस बाथरूम
प्राचीन मान्यता है कि यहां पर भैया दूज का बहुत बड़ा नहान होता था, जिसमें आसपास क्षेत्र से हजारों महिलाएं श्रद्धापूर्वक नहाने आती थीं। ऐसे में तालाब के जीर्णोद्धार कार्य के दौरान यहां पर दस बाथरूम बनाए जा रहे हैं ताकि नहाने के बाद महिलाएं कपड़े बदले सकें। साथ ही यहां एक बड़ा रसोई घर भी बनाया जा रहा है। यहां पर गरीब एवं निर्धन कन्याओं का विवाह करवाया जा सकेगा, जिसमें यह रसोई बहुत काम आएगी।
यह है लठिया वाला जोहड़ धाम की मान्यता
करीब 100 साल पहले सेठ किरोड़ीमल गंगा नहाने हरिद्वार गए थे। वहां पर नहाने के दौरान उनकी चांदी की छड़ी पानी में गायब हो गई। उन्होंने उसको बहुत तलाशा, लेकिन वह नहीं मिली। तब उनके साथ लठिया वाला जोहड़ से गए बाबा जोतनाथ ने सेठ किरोड़ीमल से कहा कि वे उनके साथ भिवानी चले और उनकी छड़ी वहीं जोहड़ में मिलेगी। सेठ किरोड़ीमल महाराज जोतनाथ के साथ यहां पर आ गए और यहां आकर जोहड़ में देखा तो उनको अपनी चांदी की छड़ी उन्हें यहीं मिली। तभी से यह एक तीर्थ स्थल के रूप आबाद हो गया। उस समय सेठ किरोड़ीमल में यहां पर अपने पिता के नाम घाट बनवाया था, जो आज भी मौजूद है।
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