तोशाम। बात करीब 11 साल पुरानी है। गैंडवास में एक गाय अंधे बछड़े को जन्म देकर मर गई। बछड़े की अंधता से बाबा तुरंतनाथ इतने विचलित हुए कि मौन व्रत के साथ-साथ खड़े होकर तपस्या का निर्णय लिया। आरंभ में 7 दिन का मौन व्रत किया। इसके बाद 21 दिन, 41 दिन, 3 महीने और फिर 9 माह तक खड़े होकर मौन व्रत चलता रहा। फिर12 महीने नंगला में, 12 महीने नारा पानीपत में, 12 महीने डूडीवाला, 3 महीने आसलवास और फिर लगातार 8 साल से मौन व्रत की यह तपस्या गांव नगला में चलती रही। अब पिछले करीबन ढाई साल से बहल मार्ग पर स्थित रोढ़ां मोड़ पर गौरक्ष शक्ति पीठ में यह व्रत चल रहा है।
सांड को साथ रखते हैं बाबा
जन्मजात अंधा यह बछड़ा अब पूरा सांड बन गया है। बाबा तपस्या के लिए जहां भी पंहुचे सांड को साथ रखा। बाबा सांड की देखरेख व खानपान का ख्याल स्वयं से भी ज्यादा रखते हैं। रोढ़ा मोड़ पर बाबा ने लोगों के सहयोग से अब गौरक्ष शक्ति पीठ की स्थापना यहां की है। इस स्थान पर ढाई साल से अखंड ज्योत जल रही है। बाबा ने गुरु गोरखनाथ के साथ सांड की खास प्रतिमा भी बनवा दी है।
60 बार रक्तदान कर चुके हैं बाबा
बाबा तुरंतनाथ अपने जीवन में 60 बार से अधिक रक्तदान भी कर चुके हैं। मौन व्रत रखने की सीमा पूछे जाने पर बाबा लिखकर बताते हैं कि मौन व्रत रखे हुए 11 साल हो चुके हैं, जब तक ईश्वर की इच्छा है व्रत जारी रहेगा।
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