बवानीखेड़ा (भिवानी)। 1857 की क्रांति में अपने सैकड़ों लाल की शहादत देने वाले गांव रोहनात के लोग अपने जमीन के मालिकाना हक के लिए सरकार व प्रशासन से लड़ाई लड़ रहे हैं। ग्रामीणों की मानें तो अधिकारों के लिए आंदोलनरत ग्रामीण की एक वर्ष पहले मौत हो गई थी। इसके बावजूद न प्रशासन का न सरकार का दिल पसीज रहा है।
अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा नीलाम की गई अपनी जमीन के लिए ग्रामीण करीब एक वर्ष से निरंतर धरना दे रहे हैं परंतु प्रशासन उनकी सुध नहीं ले रहा। आजादी की लड़ाई में कुर्बानी देने वाले ग्रामीणों के वंशज अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। गौरतलब है कि 1857 की क्रांति में अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए गांव वासियों ने खूब संघर्ष किया था। दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह के आदेश पर 29 मई 1857 को गांव वासियों ने क्रांतिकारियों का साथ देते हुए अंग्रेजी सेना पर आक्रमण बोला था। लोगों ने तोशाम, हांसी व हिसार में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला था। ग्रामीणों ने हांसी में सरकारी खजाना लूट कर 12 अंग्रेज अफसरों को हिसार तथा 11 का हांसी में कत्ल कर दिया था। संवाद
अंग्रेजों ने तोप से उड़ा दिया था गांव
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोलने पर क्रोधित अंग्रेजों ने गांव को तोप से उड़ा दिया था। सैकड़ों लोग शहीद हो गए। जो बचे थे, उन्हें हांसी में सड़क के बीच लाकर मौत के घाट उतारा था। जहां यह सजा दी गई थी आज भी हांसी में वह सड़क लाल सड़क के नाम से पहचानी जाती है।
अंग्रेजों ने नीलाम कर दी थी गांव की पूरी जमीन
14 सितंबर 1857 को गांव को बागी घोषित कर दिया था और अंग्रेजों ने गांव को नीलाम करने का फैसला किया। 20 जुलाई 1857 को जमीन नीलामी की प्रक्रिया शुरू की और महीने के अंदर गांव के लगभग 20656 बीघे और 19 मरले कृषि योग्य व गैर कृषि योग्य भूमि की नीलामी 8100 सौ रुपये में कर दी थी। जिसे आसपास के गांव के 61 लोगों ने खरीदा था। बेदखल होने के कारण गांव के किसान अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने को मजबूर हो गए। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो लोगों ने अंग्रेजों की दी हुई सजा सरकार से वापस लेने की मांग की। ग्रामीणों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक से जमीन वापस दिलवाने की गुहार लगाई लेकिन आश्वासन के अलावा लोगों को कुछ नहीं मिला। तत्कालीन संयुक्त पंजाब में मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो ने 1966 में रोहनात वासियों को मुआवजा व जमीन हिसार के बीड फार्म में देने की बात कही लेकिन इसी दौरान एक नवंबर 1966 को हरियाणा अपने अस्तित्व में आ गया और नया राज्य बन गया। गांव वासियों ने हरियाणा सरकार के सामने मांगें रखीं लेकिन सरकार ने खजाने में पैसे न होने की बात कह कर पल्ला झाड़ लिया। इस प्रकार रोहनात वासियों को जमीन आज तक नहीं मिली। इसके बाद गांववासी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को भी नहीं मनाते थे। यहां तक कि गांव के लोग आजादी के पर्व में भी भाग नहीं लेते थे।
15 अगस्त 2010 में गांव में फहराया था काला झंडा
मांगें पूरी नहीं होने पर रोष स्वरूप 15 अगस्त 2010 को गांव में लोगों ने काला झंडा भी फहराया था, जो देशभर में चर्चा का विषय भी रहा था। इसके बाद 23 मार्च 2018 शहीद दिवस को मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने ग्रामीणों के साथ मिलकर उनके दर्द को समझा और गांव में तिरंगा झंडा फहराया और ग्रामीणों की मांग को जल्द पूरा करवाने का आश्वासन दिया। ग्रामीण प्रदीप कौशिक, रामप्रसाद कौशिक, धर्मबीर फौजी, जोगेंद्र पानू, सीताराम बुरा, बलराज कस्वां, मास्टर सरजू शर्मा ने बताया कि सरकार ने उनकी मांगों को आज तक पूरा नहीं किया। उन्होंने बताया कि पांच साल बीतने के बाद भी ग्रामीणों को हिसार के गांव बीड में आवंटित किए गए प्लाॅट नहीं मिले।
एक वर्ष से ग्रामीण अधिकारों के लिए दे रहे धरना
ग्रामीणों ने 10 अगस्त 2022 को गांव को स्वतंत्रता सेनानी गांव घोषित करने व सरकार द्वारा आवंटित किए गए स्थान पर प्लाॅट दिए जाने व विभिन्न पट्टियों में बंटे गांव की पट्टी को तोड़कर जमीन गांव के नाम करने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए। शुरुआत में तो ग्रामीण गांव के ही क्रांतिकारी कुएं के पास धरना दे रहे थे। करीब चार माह पहले अप्रैल में ग्रामीणों ने वहां से धरना उठाकर जिले के लघु सचिवालय के बाहर डेरा डाल दिया और वहीं पर धरनारत बने हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक सरकार द्वारा की गई घोषणा की मांगें पूरी नहीं होती तब तक वे अनिश्चितकाल तक धरनारत रहेंगे।
यह मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। मैंने अभी नया ज्वाइन किया है। लिखित में शिकायत दीजिए। उसके बाद ही बता पाऊंगा ।
- दीपक बाबू लाल करवां, एसडीएम भिवानी