बवानीखेड़ा में किसान के घर पर खड़ी भैंस।
भिवानी। भीषण गर्मी के बीच हरे चारे, पर्याप्त ठंडे पानी और हवादार बाड़ों की व्यवस्था से दुधारू पशुओं के दुग्ध उत्पादन में कमी आने से बचाया जा सकता है। क्षेत्र में तापमान बढ़ने के कारण दूध उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की जा रही है जिसे सही देखभाल से रोका जा सकता है। पशु चिकित्सक विजय सनसनवाल के अनुसार लू के कारण पशुओं में इलेक्ट्रोलाइट्स और पानी की भारी कमी हो रही है जिससे बुखार, डिहाइड्रेशन और दस्त जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
उन्होंने बताया कि इस गर्मी के तनाव का सीधा असर दुग्ध उत्पादन पर पड़ रहा है। पशुओं को लू और बीमारियों से बचाने के लिए विभाग ने मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) भी जारी की है। डॉ. सनसनवाल ने पशुपालकों को सलाह दी कि पशुओं को बंद कमरों के बजाय हवादार बाड़ों में रखें। यदि बाड़े की छत टीन की है तो उस पर घास या पुआल डालें और समय-समय पर पानी का छिड़काव करें ताकि तापमान कम बना रहे। बाड़ों में कूलर का उपयोग भी फायदेमंद है।
उन्होंने बताया कि भैंस व अन्य पशुओं को सूर्य निकलने से पहले या सूर्यास्त के बाद तालाब (जोहड़) में ले जाएं। दिन के समय उन्हें सुबह-शाम ताजे पानी से नहलाएं और दिन में कम से कम तीन से चार बार साफ व ताजा पानी पिलाएं। पशुओं की ऊर्जा बनाए रखने के लिए उनके आहार में बदलाव जरूरी है। पशुपालक हरे चारे की मात्रा बढ़ाएं, पानी में गुड़ घोलकर पिलाएं और इलेक्ट्रोलाइट्स दें जिससे लू से बचाव संभव है। प्रति पशु प्रतिदिन 50-50 ग्राम खनिज मिश्रण देना भी जरूरी है। यदि पशु को खल या बिनौला दिया जा रहा है तो उसे खिलाने से कम से कम दो घंटे पहले पानी में भिगोकर रखें।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसी पशु की आंखें धंसी हुई दिखाई दें या उसकी चमड़ी ढीली पड़ने लगे तो यह गंभीर डिहाइड्रेशन के लक्षण हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें और पशु को इलेक्ट्रोलाइट्स व ग्लूकोज जैसे ठंडक देने वाले पदार्थ दें। उन्होंने कहा कि गर्मी के इस मौसम में थोड़ी सी सावधानी बरतकर पशुपालक अपने पशुओं को बीमारियों से बचाने के साथ-साथ दुग्ध उत्पादन में होने वाले नुकसान को भी कम कर सकते हैं।