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सरूप भक्ति से भक्त और परमात्मा एक हो जाते हैं : कंवर महाराज

Mon, 22 Apr 2024 03:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
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भिवानी। संतों के दरबार की तरफ बढ़ाया गया एक-एक कदम यज्ञ के समान है। संत जीव से तन-मन-धन की बाजी लगवाते हैं। भक्ति करने वालों के लिए बाजी परमात्मा से ही लगती है। यह एकमात्र ऐसी बाजी है उसमें हर तरह से यह बाजी लगाने वाला भक्त ही जीतता है। सरूप भक्ति से भक्त और परमात्मा एक हो जाते हैं। यह सत्संग वचन संत कंवर महाराज ने दिनोद गांव में स्थित राधास्वामी आश्रम में फरमाए।
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कंवर महाराज ने फरमाया कि दुनियादारी की सारी बाजियों में जीतने वाला तो लाभ में रहता है और हारने वाले हानि में लेकिन परमात्मा से खेली बाजी में अगर हम जीतते है तो भी लाभ में रहते है और हारते हैं तो भी। गुरु महाराज ने कहा कि इस बाजी में आनंद भी तभी है जब हम अपना सर्वस्व लगा देते हैं। महाराज ने कहा कि सतगुरु से दीक्षा के समय ही गुरु आपसे आपका तन-मन और धन ले लेता है। बदले में आपको वो मार्ग देता है जिसे अपना कर आप परमात्मा के घर को पा सकते हो। नाम दान से बड़ा दान नहीं है क्योंकि यह आपको जगत से ऊपर उठाकर अगत से जोड़ता है।
उन्होंने कहा कि चार प्रकार के जीव है जो अंडे, जेर पसीने और वीर्य से पैदा होते हैं। लेकिन हर प्रकार के जीवों में इंसान सबसे उत्तम है। उन्होंने कहा कि इस योनि में आकर भी चौरासी से न निकलने वाला जीव उस अंधे की भांति है। जो इस जगत रूपी काल कोठरी के दरवाजे पर आकर भी बाहर निकलने से चूक जाता है। कंवर महाराज ने कहा कि बिना नाम के ध्यान नहीं है। नाम मिलेगा सतगुरु से। मुक्ति के भी चार प्रकार हैं सालोक, सामीप्य, सायुज्य और सरूप। इन सबमें सबसे उत्तम है सरूप भक्ति क्योंकि ये भक्ति की वह अवस्था है। जिसमे भक्त और परमात्मा एक रूप हो जाते हैं।
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