अमर उजाला ब्यूरो
भिवानी। तीन दिन में बंदरों सेक्टर-23 में नौ लोगों को निशाना बनाते हुए घायल कर दिया है। परेशान लोग नगर परिषद को कोस रहे है और अस्पताल में इंजेक्शन लगवा रहे हैं। सेक्टर 23 के अलावा दर्जनभर से अधिक कॉलोनियों में बंदरों का आतंक है। बंदर अस्पताल में मरीजों और कर्मचारियों की बाइक से टिफिन निकाल ले जाते हैं। घरों में फ्रिज खोलकर सामान निकाल ले जाते हैं। पिछले एक महीने में करीब तीन सौ लोगों सामान्य अस्पताल में एंटी रैबिज के इंजेक्शन लगवाए हैं, जिनमें अधिकतर बंदर काटने के हैं। इसके अलावा प्राइवेट अस्पतालों में भी लोग इलाज के लिए जा रहे हैं।
देवेंद्र सांगवान ने बताया कि सेक्टर के अंदर बंदरों की समस्या को लेकर कई बार प्रशासन व हुडा विभाग के साथ साथ नगर परिषद को भी अवगत कराया, मगर हर बार उनकी मांग को अनसुना कर दिया गया। बंदर काटे के निशान दिखाते हुए नरेश कुमार ने बताया कि पता ही नहीं लगता, बंदर कब पीछे से हमला कर दें। महिला संतोष ने बताया कि बंदरों के आतंक के कारण घरों में कैद होकर रह गए हैं। बच्चे बाहर निकलने से डरते है। अजय श्योराण, प्रेम ने कपड़े फाड़ देते है, घरों के अंदर से सामान उठा ले जाते है।
अस्पताल में मरीज और कर्मचारी असुरक्षित
सामान्य अस्पताल में भी 25 से 30 बंदरों की टोली इन दिनों आतंक का कारण बनी है। ये बंदरों की टोली अस्पताल के वार्डों में भी घूमती रहती है और पार्क में डेरा डालते रहती है। जिस कारण मरीज ही नहीं कर्मचारी भी डर के साये में रहते हैं। इस बारे में सिविल सर्जन डॉ. आदित्य स्वरूप गुप्ता ने बताया कि उन्होंने डीसी कार्यालय और नगर परिषद को बंदरों की समस्या को लेकर पत्र लिखा है।
तीन साल पहले चलाया था अभियान
तीन साल पहले नगर परिषद ने मथुरा के ठेकेदार को बंदर पकड़ने का ठेका दिया था, मगर वाइल्ड लाइफ की बंदिशों के चलते ठेका बीच में ही छोड़कर ठेकेदार भी चलता बना। इसके बाद किसी भी इलाके में बंदर नहीं पकड़े गए, जबकि बंदरों की संख्या बढ़ती जा रही है।
सेक्टर 23 में बंदरों ने इन्हें बनाया शिकार
सेक्टर वासी गोपाल, सुशीला, नरेश, सुमन, संतोष, नरेश, अजय श्योराण, प्रेम देवेंद्र सांगवान को बंदरों ने काट लिया।
यूं छलका लोगों की जुबां पर दर्द
घरों में हुए कैद, बच्चे नहीं जा सकते बाहर खेलने
बंदरों का आतंक इतना है कि घरों में कैद होकर रह गए है। छतों पर दिनभर बंदर घुमते हैं, अगर गलती से भी मकान के ऊपर जाने का रास्ता खुला छुट गया तो फिर मकान के अंदर समझो बंदरों का ही कब्जा है। जिला प्रशासन और नगर परिषद बंदरों के आतंक से जल्द निजात दिलाए। बच्चे बाहर खेलने नहीं जा सकते।
सुशीला, सेक्टर 23
विरोध किया तो काट लिया
बंदरों को भगाने के लिए गया तो विरोध करने लगे। जब डंडा दिखा तो उसे ही काट लिया। हमेशा डर रहता है कि परिवार के किसी सदस्य को गंभीर चोट ना पहुंचा दें। इस कारण घर के दरवाजे हमेशा बंद रखने पड़ते है।
गोपाल दास, दुकानदार
बंदर पकडने की मंजूरी मिल गई है। जल्द ही टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाएगी। जिसके बाद ठेका देकर बंदरों को पकड़वा जंगलों में छूड़वाया जाएगा।
विकास कुमार, सेनेटरी इंस्पेक्टर