भिवानी जिले के हजारों बच्चों पर खसरा, रतौंदी, गलघोटू, निमोनिया, दीमागी बुखारी जैसी बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। अनेक बच्चे इलाज के लिए अस्पताल भी पहुंच रहे है। बच्चों के लिए खतरा बनी इन बिमारियों के लिए बच्चों के अभिभावक ही जिम्मेदार है। दरअसल बच्चों का पूरा टीकाकरण नहीं हो रहा। करीब 30 फीसदी बच्चों के माता-पिता लापरवाही बरतते हुए टीकाकरण को बीच में ही छोड़ रहे है। जो बच्चों के लिए घातक साबित हो रहा है।
अभिभावकों की लापरवाही बच्चों पर भारी पड़ रही है। बच्चों पर खसरा, निमोनिया का बड़ा खतरा है। खसरा की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से विशेष अभियान चलाने के बावजूद औसतन पांच से छह खसरा पीड़ित बच्चे हर महीने अस्पताल पहुंच रहे है। इनके अलावा हर रोज बुखार, दस्त, खासी के करीब 60 बच्चे अकेले सामान्य अस्पताल पहुंच रहे है। इसका मुख्य कारण नियमित टीकाकरण नहीं होना है। करीब 30 फीसदी अभिभावक साढ़े तीन माह तक के ही टीके लगवाते है। उसके बाद बच्चे को लेकर अभिभावक लापरवाह हो जाते है और बाद के इंजेक्शन नहीं लगवाते। इससे भी खतरनाक बात यह है कि पहले टीकों के बाद ही पांच-पांच प्रतिशत की गिरावट शुरू हो जाती है।
बढ़ा है ड्राप आउट बच्चों का आंकड़ा
औसतन हर साल करीब 27 हजार बच्चे जिले भर में पैदा हो रहे है यानी हर महीने करीब ढाई हजार। यानी हर साल करीब पांच हजार से अधिक बच्चे ड्राप आउट का शिकार हो रहे है। पिछले पांच सालों में यह आंकड़ा करीब 30 हजार के पार जा चुका है। ड्राप आउट की लगातार बढ़ती संख्या स्वास्थ्य विभाग के लिए भी चिंता का विषय है। अब एएनएम, आंगनबाड़ी वक्र्स के माध्यम से सर्वे करवाया जा रहा है। इसके अलावा टीकारण के कारण कुछ बच्चों को हलके बुखार की शिकायत होती है। जिस कारण भी अभिभावक नियमित टीकारण नहीं करवा रहे।
कब-कब कौन सा लगता है इंजेक्शन
* जन्म के समय : बीसीजी, ओपीवी, एचईपी बी। इन टीकों से टीबी, पीलिया, पोलियो से बचाव होता है।
* डेढ़ माह पर : ओपीवी वन, पेंटा वन व रोटा वन। इनसे से गलघोंटू, काली खासी, टिटनेस, निमोनिया, दीमागी बुखार, पोलियो और दस्त से बचाव हाता है।
* ढाई माह पर : ओपीवी टूट पेंटा टू: यह भी गलघोंटू, काली खासी, टिटनेस, निमोनिया, दीमागी बुखार, पोलियो और दस्त से बचाव के लिए है। यह बीमारियों से बचाव की दूसरी डोज है।
* साढ़े तीन माह : यह सात बीमारियों से बचाव की तीसरी डोज है। इसके साथ आईपीवी लगाया जाता है। जो पोलियो की रोकथाम के लिए अहम है।
* नौंवे माह : मिसल्स, विटामिन ए-वन, जेई वन। ये टीके खसरे की रोकथाम, रतौंदी की रोकथाम के लिए लगाए जाते है।
* 16 से 24 माह : मिस्ल्स टू, विटामिन ए-2,जेई 2। ये टीके नौंवे माह लगने वाले इंजेक्शन की दूसरी डोज है।
* 16-24 माह : इसी समयावधि ओपीवी, डीपीटी बूस्टर वन। ये डिप्थीरिया, काली खांसी और टिटनेस के बचाव के लिए है।
* 05-06 वर्ष : डीपीटी: यह भी डिप्थीरिया, काली खांसी और टिटनेस के लिए है और यह दूसरी डोज है।
नियमित टीकाकरण का पूरा नहीं होना गंभीर विषय है। करीब 80 से 85 प्रतिशत बच्चों के अभिभावक ही टीकाकरण करवाते है। उसमें भी करीब 20 से 30 फीसदी बच्चों का ड्राप आउट होना चिंता का विषय है। अभिभावकों की लापरवाही के कारण बच्चों में बीमारियां बढ़ रहा है। खसरा, निमोनिया जैसी घातक बीमारियों के केस भी आ रहे है।
डॉ. राज महता, बाल रोग विशेषज्ञ, सामान्य अस्पताल
ड्राप आउट बच्चों की वेक्सीनेशन केलिए प्रयास किए जा रहे है। इसके लिए एएनएम, आंगनबाड़ी वर्कर्स की सहायता ली जा रही है। ड्राप आउट बच्चों की संख्या काफी है मगर इसमें प्रवासी मजदूर भी काफी होते है जो कुछ समय यहां रहने के बाद दूसरे राज्यों में चले जाते है। भट्ठों पर रहने वाले परिवारों, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्लानिंग की जा रही है।
डॉ. सुनील कुमार, डिप्टी सिविल सर्जन, स्वास्थ्य विभाग