भिवानी। अध्यापकों की मेहनत से न केवल विद्यार्थी, बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव आते हैं। ऐसे ही कुछ शिक्षक, जो सामान्य सीमाओं से परे जाकर समाज में नई कहानी लिखते हैं, उनमें शामिल हैं संस्कृत प्रवक्ता डॉ. मुरलीधर द्विवेदी और सेवानिवृत्त प्राचार्य रमेशचंद्र बूरा। इनके प्रयासों ने कई लोगों की जिंदगी में नई रोशनी दी है। उनकी लगन और समर्पण समाज में सकारात्मक प्रभाव छोड़ रहा है।
गीता केवल ग्रंथ नहीं, जीने की कला सिखाती है
गांव कायला के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के संस्कृत प्रवक्ता डॉ. मुरलीधर द्विवेदी ने स्वामी सदानंद महाराज व ज्ञानानंद महाराज के मार्गदर्शन में जिला कारागार में बंदियों को हर रविवार गीता पाठ कराना शुरू किया है। तीन महीने से वे गीता के श्लोकों के माध्यम से जीवन की सच्चाई और कर्मयोग की शिक्षा दे रहे हैं। उनका मानना है कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाती है। इस पहल से जेल में बंद बंदियों को नई शुरुआत का अवसर मिलेगा और उनका अपराध बोध कम होगा। डॉ. मुरलीधर शिक्षा को नौकरी तक सीमित न मानते हुए इसे सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का माध्यम बताते हैं।
बेटियों के जीवन में जलाई शिक्षा की लौ
गांव प्रेमनगर के रमेशचंद्र बूरा ने 1989 में लिपिक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की, जो 2020 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। अपने कार्यकाल में उन्होंने राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय को उत्कृष्ट विद्यालय बनाया और हजारों बेटियों के जीवन में शिक्षा की लौ जलाई। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे ग्राम विकास और शिक्षा समिति के माध्यम से युवाओं के लिए डिजिटल लाइब्रेरी, खेल गतिविधियों और विभिन्न सामाजिक अभियानों को बढ़ावा दे रहे हैं। उनके प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, प्रौढ़ शिक्षा और कानूनी जागरूकता के क्षेत्र में गांव में सकारात्मक बदलाव आया है। वर्तमान में वे जलभराव से प्रभावित बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।